कविता और भाला / आलोक बसु
कविता को मैं किसी भी कीमत पर भाले की तरह नहीं रच पाता
सब कुछ ठीक बनता है
सिर्फ मुंह पैना बनाते-बनाते टूट जाता है जबकि
उनके सीने को निशाना बनाकर भाला फेंकने के दिन आ गए हैं।
कविता को मैं किसी भी कीमत पर भाले की तरह नहीं रच पाता
जबकि कविता का मुंह पैना बनाने के दिन आ गए हैं
इसलिए भाले की तरह कविता लिखने से पहले
मैं किसी संग्राम के लोहारखाने का कारीगर बनना चाहता हूं।
एइ देश ए समय (संकलन) 1972
(अनुवाद: कंचन कुमार)
















