छत्तीसगढ़ के खूबसूरती से भरपुर मैनपाट
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छत्तीसगढ़ के खूबसूरती से भरपुर मैनपाट
पत्नी, संतान और माता-पिता के भरण-पोषण से सम्बन्धित प्रावधान - धारा 125 सीआरपीसी 1973
भरण-पोषण का अधिकार – दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 125 पत्नी, सन्तान एवं माता-पिता के भरण-पोषण के अधिकार के बारे में प्रावधान करती है, इसके अनुसार यदि पर्याप्त साधनों (Sufficient means) वाला कोई व्यक्ति – (क) अपनी पत्नी का, जो अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ है, या (ख) अपनी धर्मज या अधर्मज (legitimate or illegitimate) अवयस्क सन्तान का चाहे विवाहित हो या ना हो, जो अपना भरण पोषण करने में असमर्थ है, या (ग) अपनी धर्मज या अधर्मज सन्तान का (जो विवाहित पुत्री नहीं हैं) जिसने वयस्कता प्राप्त कर ली है, जहाँ ऐसी सन्तान किसी शारीरिक या मानसिक असामान्यता या क्षति के कारण अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ है, या (घ) अपने पिता या माता का, जो अपना भरण पोषण करने में असमर्थ हैं, का भरण-पोषण करने में उपेक्षा करता है या भरण-पोषण करने से इन्कार करता है, उस स्थिति में ऐसी पत्नी, सन्तान एवं माता-पिता अपने पति, पिता एवं पुत्र से प्रतिमाह भरण-पोषण की युक्तियुक्त एंव निर्धारित राशि प्राप्त करने के हक़दार होंगे। अवयस्क विवाहित पुत्री का भरण-पोषण का अधिकार - कई बार हमारे सामने यह प्रशन आता है कि, क्या अवयस्क विवाहित पुत्री भी अपने पिता से भरण- पोषण की माँग कर सकती है, यहाँ यह उल्लेखनीय है कि संहिता की धारा 125 के अधीन ऐसी अवयस्क विवाहित पुत्री भी अपने पिता से भरण-पोषण पाने की मांग कर सकती है –(i) जिसके पति के पास भरण-पोषण के पर्याप्त साधन नहीं हो या (ii) जब तक वह वयस्क नहीं हो जाये। क्या अधर्मज सन्तान भरण-पोषण का अधिकारी है - संहिता की धारा 125 (1) ख एवं (ग) के अन्तर्गत अधर्मज सन्तान (illegitimate children) को भी अपने पिता से भरण-पोषण पाने का हक़दार माना गया है, यदि -(i) वह अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ है; (ii) अवयस्क है; और (iii) यदि वयस्क है तो शारीरिक या मानसिक असामान्यता या क्षति के कारण अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ है। श्रीमती यमुनाबाई अनन्तराव बनाम अनन्तराव शिवराम के मामले में - अधर्मज सन्तान को अपने पिता से भरण-पोषण पाने का हक़दार माना गया है। (ए. आई. आर. 1988, ए. सी. 644) माता-पिता भरण-पोषण के अधिकारी कब होते है - संहिता की धारा 125 (1) (घ) के अन्तर्गत माता-पिता भी अपने पुत्र से भरण-पोषण की मांग निम् स्थितियों में कर सकते है, यदि -(i) वे स्वयं अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ हो, या (ii) पुत्र के पास भरण-पोषण के पर्याप्त साधन हों। Read More This Post – भरण पोषण से संबंधित कानून Sec. 125 CrPC Read the full article
दंड प्रक्रिया संहिता 1973 के तहत अपराधों के शमन की अवधारणा
अपराधों का शमन - प्राय: शमन से तात्पर्य – किसी प्रकरण में समझौता अर्थात् राजीनामा है और अपराधों का शमन से तात्पर्य - पक्षकारों के बीच किसी आपराधिक मामले में समझौता अर्थात् राजीनामा हो जाना है। आपराधिक कानून में पीड़ित पक्षकार के पास अपराध को शमन करने की योग्यता होती है| शमन का उद्देश्य आपराधिक कार्यवाही को समाप्त करते हुए पक्षकारों के मध्य मधुर सम्बन्धों को बनाये रखना है। अपराधों का शमन कौन कर सकता है - शमन यानि राजीनामा सामान्यतः प्रकरण के पक्षकारों द्वारा किये जाते है, संहिता की धारा 320 की उपधारा (1) व (2) की सारणियों के तीसरे स्तम्भ में उन व्यक्तियों का उल्लेख किया गया है जिनके द्वारा राजीनामा किया जा सकता है। यदि राजीनामा करने वाला व्यक्ति - (i) अवयस्क, (ii) पागल, या (iii) जड़ है तो उसकी ओर से संविदा करने योग्य व्यक्ति माननीय न्यायालय की अनुज्ञा/इजाजत से राजीनामा कर सकता है। यदि राजीनामा करने वाले व्यक्ति की मृत्यु हो गई है तो उसका विधिक प्रतिनिधि राजीनामा कर सकता है।अपराधों का शमन योग्य होना - आपराधिक कार्यवाही में कुछ ऐसे अपराध होते है जिनमे पीड़ित पक्षकार स्वेच्छा एवं स्वतन्त्र सहमति से राजीनामा कर उन अपराधों का शमन कर सकते है लेकिन अनेक ऐसे अपराध होते है जिनमे पीड़ित पक्षकार को राजीनामा करने से पूर्व माननीय न्यायालय की इजाजत की आवश्यकता होती है यानि ऐसे अपराधों में राजीनामा करने से पूर्व न्यायालय की इजाजत लेनी होगी| सीआरपीसी की धारा 320 की उपधारा (1) में ऐसे अपराधों का उल्लेख किया गया है जिनमें मामले के पक्षकार स्वेच्छा एवं स्वतन्त्र सहमति से राजीनामा कर सकते है, एंव सीआरपीसी की धारा 320 की उपधारा (2) में ऐसे अपराधों का उल्लेख किया गया है जिनमें राजीनामा केवल न्यायालय की पूर्व अनुज्ञा से ही किया जा सकता है दामन बनाम स्टेट ऑफ केरल के मामले अनुसार - धारा 320 के उपबन्ध आज्ञापक है, इनका कठोरता से पालन किया जाना चाहिए। (ए.आई. आर. 2014 एस.सी. 1437) सुधीर कुमार बनाम एम.एम. कुन्हीरमण के प्रकरण में निर्धारित किया गया है कि, चैक अनादरण के मामलों में राजीनामा किया जा सकता है और ऐसे राजीनामे का परिणाम अभियुक्त का दोषमुक्त होना है। (ए.आई.आर. 2008 एन.ओ.सी. 1005 केरल) अपराधों के शमन की सारणी जिसे दो भागों में विभाजित किया गया है - (i) शमन योग्य अपराध (न्यायालय की अनुमति के बिना), (ii) शमन योग्य अपराध (न्यायालय की अनुमति से) Read More This Post - Section 320 of CrPC Explain in Hindi Read the full article
दोहरे दंड से क्या अभिप्राय है | Double Jeopardy in hindi और इसके प्रमुख अपवाद
दोहरे खतरे से संरक्षण (Double Jeopardy) - भारतीय दाण्डिक विधि का यह महत्वपूर्ण सिद्वान्त है कि, किसी भी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए दुबारा जोखिम में नहीं डाला जा सकता। (A person can not be put into peril twice the same offence) भारतीय संविधान के अनुच्छेद 20 (2) में यह प्रावधान किया गया है कि - "किसी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए एक बार से अधिक अभियोजित और दण्डित नहीं किया जायेगा।" इसे 'दोहरे दण्ड से संरक्षण' अथवा 'दोहरे खतरे से संरक्षण' (Double Jeopardy) का सिद्धान्त के नाम से भी जाना जाता है| यह सिद्धान्त Nemo debet lis vexare procodem सूत्र पर आधारित है इसे दुसरे शब्दों में Nemo debet vis vexari भी कहा गया है यानि किसी भी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए दो बार न तो अभियोजित किया जा सकता है और न ही दण्डित। दोहरे खतरे से संरक्षण धारा 300 में अन्तर्निहित सिद्धान्त – संहिता की धारा 300 में कहा गया है कि - "एक बार दोषसिद्ध या दोषमुक्त किये गये व्यक्ति का उसी अपराध के लिए दुबारा विचारण नहीं किया जायेगा।" संहिता की धारा 300 की उपधारा (1) का मूल सार यह है कि – जिस व्यक्ति का किसी अपराध के लिए सक्षम अधिकारिता वाले न्यायालय द्वारा एक बार विचारण किया जा चुका है और जो ऐसे अपराध के लिए दोषसिद्ध या दोषमुक्त किया जा चुका है, वह जब तक ऐसी दोषसिद्धि या दोषमुक्ति प्रवृत्त रहती है, तब तक न तो उसी अपराध के लिए विचारण का भागी होगा और न उन्हीं तथ्यों पर किसी ऐसे अन्य अपराध के लिए विचारण का भागी होगा जिसके लिए उसके विरुद्ध लगवाये गये आरोप से भिन्न आरोप धारा 221 की उपधारा (1) के अधीन लगाया जा सकता था और जिसके लिए वह उसकी उपधारा (2) के अधीन दोषसिद्ध किया जा सकता था। उदाहरण - ख के आपराधिक मानव वध के लिए क पर सेशन न्यायालय के समक्ष आरोप लगाया जाता है और वह दोषसिद्ध किया जाता है। यहाँ ख की हत्या के लिए क का उन्हीं तथ्यों पर तत्पश्चात् विचारण नहीं किया जा सकता है। दोहरे खतरे से संरक्षण की आवश्यक शर्तें – संहिता की धारा 300 के प्रावधानों का लाभ लेने के लिए निम्नलिखित शर्तों का पूरा होना जरुरी है - (1) अभियुक्त किसी अपराध के लिए विचारित किया जाकर एक बार दोषसिद्ध या दोषमुक्त किया जा चुका हो, (2) उस अपराध के लिए जिसके लिए उसके विरुद्ध लगाये गये आरोप से भिन्न आरोप धारा 221 की उपधारा (1) के अधीन लगाया जा सकता था और जिसके लिए वह उपधारा (2) के अधीन दोषसिद्ध किया जा सकता था, उसी अपराध के लिए नया विचारण आरम्भ किया गया हो; (गवर्नमेन्ट ऑफ बम्बई बनाम अब्दुल वहाब, ए. आई. आर. 1946 बम्बई 38 ) एंव (3) प्रथम विचारण किसी सक्षम न्यायालय द्वारा किया गया हो। (बी. एम. रतनवेलू बनाम के. एस. अय्यर, ए. आई. आर. 1933, मद्रास 765) दोहरे खतरे से संरक्षण के अपवाद – धारा 300 में प्रतिपादित सिद्धान्त निरपेक्ष सिद्धान्त नहीं है। इसके कुछ अपवाद भी हैं अर्थात् कतिपय परिस्थितियों में किसी व्यक्ति का उन्हीं तथ्यों पर दुबारा विचारण किया जा सकता है। यह अपवाद निम्नलिखित है - (i) राज्य सरकार की सहमति से पुनः विचार - उपधारा (2) में यह कहा गया है कि किसी अपराध के लिए दोषसिद्ध या दोषमुक्त किये गये व्यक्ति का, उस भिन्न अपराध के लिए, जिस पर धारा 220 (1) के अन्तर्गत प्रथम विचारण के समय ही पृथक् आरोप लगाया जा सकता था, बाद में राज्य सरकार की सहमति से विचारण किया जा सकेगा। (ii) भिन्न परिणाम पैदा होने पर विचारण – उपधारा (3) में यह कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति ऐसा कोई अपराध करता है जो कि अनेक कार्यों से निर्मित हुआ है और उसको किसी एक कार्य के लिए दोषसिद्ध या दोषा त किया जा चुका है, तो बाद में यदि उस कार्य के परिणाम से कोई भिन्न अपराध गठित होता है तो उस भिन्न अपराध के लिए उसका विचारण किया जा सकेगा।(iii) पूर्व न्यायालय के सक्षम नहीं होने पर विचारण – उपधारा (4) में यह उपबंधित किया गया है कि-यदि किसी व्यक्ति को किन्हीं कार्यों से गठित किसी अपराध के लिए दोषसिद्ध या दोषमुक्त किया गया है, फिर भी उस पर उन्हीं कार्यों से गठित किसी अन्य अपराध के लिए आरोप लगाया जा सकेगा और उसका विचारण किया जा सकेगा, बशर्ते कि वह न्यायालय जिसके द्वारा प्रथम विचारण किया गया था, बाद वाले आरोप को सुनने के लिए सक्षम नहीं रहा हो।Read More This Post - दोहरे दंड से क्या अभिप्राय है | Double Jeopardy in hindi Read the full article
वारन्ट केस क्या है, मजिस्ट्रेट द्वारा इसका विचारण कैसे किया जाता है
जैसा की हम जानते है कि प्रकृति एवं प्रक्रिया की दृष्टि से आपराधिक मामलें दो तरह के होते है - (क) समन केस (Summons Case) (ख) वारन्ट केस (Warrant Case) वारन्ट केस क्या है What is Warrant Case - वारन्ट केस की परिभाषा संहिता की धारा 2 (भ) में दी गई है। इसके अनुसार - वारन्ट मामले से तात्पर्य ऐसे मामलों से है जो मृत्यु, आजीवन कारावास या दो वर्ष से अधिक की अवधि के कारावास से दण्डनीय अपराध से सम्बन्धित होते है| सरल शब्दों में कहा जा सकता है कि ऐसे अपराधों से संबंधित समस्त मामले, जो 2 वर्ष से अधिक के कारावास से दंडनीय है ,वारंट मामले होते हैं। वारन्ट केस के विचारण की प्रक्रिया – दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 238 से 250 तक में वारन्ट केस (Warrant Case) के विचारण की प्रक्रिया का उल्लेख किया, विचारण की प्रक्रिया की दृष्टि से वारन्ट मामलों के विचारण की प्रक्रिया को दो भागों में विभाजित किया गया है - (क) पुलिस रिपोर्ट पर संस्थित मामले, (ख) पुलिस रिपोर्ट से भिन्न आधार पर संस्थित मामले(क) पुलिस रिपोर्ट पर सस्थित वारन्ट केस में प्रक्रिया दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 238 से 243 तक में पुलिस रिपोर्ट पर संस्थित वारन्ट मामलों में विचारण की प्रक्रिया का उल्लेख किया गया है। इनके अनुसार विचारण की प्रक्रिया निम्नानुसार है - (1) अभियुक्त को पुलिस रिपोर्ट तथा अन्य दस्तावेजों की प्रतिलिपियाँ दिया जाना - संहिता की धारा 238 के तहत जब पुलिस रिपोर्ट पर संस्थित किसी वारन्ट मामले में अभियुक्त को विचारण के प्रारम्भ में मजिस्ट्रेट के समक्ष लाया जाता है या वह हाजिर होता है तब सर्वप्रथम उसे पुलिस रिपोर्ट की एवं अन्य दस्तावेजों की प्रतिलिपियाँ दी जायेगी और मजिस्ट्रेट द्वारा इस बात का समाधान कर लिया जायेगा कि अभियुक्त को ऐसी प्रतिलिपियाँ दे दी गई है। आम भाषा में इसे 'चालान' अथवा 'चार्जशीट' (आरोप-पत्र) की नकल कहा जाता है। (2) आरोप निराधार होने पर अभियुक्त को उन्मोचित किया जाना – अभियुक्त को पुलिस रिपोर्ट तथा दस्तावेजों की प्रतिलिपियाँ दे देने के पश्चात् मजिस्ट्रेट द्वारा -(i) ऐसी रिपोर्ट पर विचार किया जायेगा (ii) आवश्यक होने पर अभियुक्त की परीक्षा की जा सकेगी (iii) अभियुक्त व अभियोजन को सुनवाई का अवसर प्रदान किया जायेगा। इसे प्रचलित भाषा में 'बहस चार्ज' कहा जाता है। (3) आरोप की विरचना – लेकिन यदि मजिस्ट्रेट यह पाता है कि अभियुक्त के विरुद्ध यह उपधारणा किये जाने के आधार है कि -(i) उसके द्वारा कोई अपराध कारित किया गया है (ii) ऐसे अपराध का विचारण करने के लिए वह सक्षम है (iii) उसकी राय में अभियुक्त को पर्याप्त रूप से दण्डित किया जा सकता है, तब अभियुक्त के विरुद्ध आरोप की लिखित में विरचना की जायेगी तथा ऐसा आरोप अभियुक्त को पढ़कर सुनाया व समझाया जायेगा। अभियुक्त से यह भी पूछा जायेगा कि वह अपने आरोप को स्वीकार करता है या उसका विचारण चाहता है। (धारा 240) (कर्नल एस. कश्यप बनाम स्टेट ऑफ राजस्थान, ए.आई. आर. 1971, एस. सी. 1120) (4) दोषी होने के कथन पर दोषसिद्ध किया जाना – दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 241 के अनुसार यदि आरोप सुनाये जाने के पश्चात् अभियुक्त अपने दोषी होने का अभिवाक करता है अर्थात् आरोप को स्वीकार करता है तो मजिस्ट्रेट ऐसी स्वीकारोक्ति को लेखबद्ध करते हुए उसके आधार पर स्वविवेकानुसार उसे दोषसिद्ध कर सकेगा।(5) अभियोजन की साक्ष्य लेना – जहाँ आरोप सुनाये जाने के पश्चात् अभियुक्त दोषी होने का अभिवाक् नहीं करता है और विचारण चाहता है, वहाँ मजिस्ट्रेट द्वारा अभियोजन पक्ष की साक्ष्य लेखबद्ध की जायेगी। (धारा 242) स्टेट बनाम सुवा के प्रकरण अनुसार - मजिस्ट्रेट द्वारा उस समस्त साक्ष्य को लेखबद्ध किया जायेगा जो अभियोजन के समर्थन में उसके समक्ष प्रस्तुत की जाये। (ए.आई. आर. 1962, राजस्थान 134 ) (6) प्रतिरक्षा की साक्ष्य लेना – अभियोजन की साक्ष्य पूर्ण हो जाने पर अभियुक्त की प्रतिरक्षा (defence) को साक्ष्य ली जायेगी और यदि अभियुक्त कोई लिखित कथन देना चाहे तो उसे अभिलेख पर फाइल किया जायेगा। अभियुक्त किसी साक्षी को न्यायालय की आदेशिका से हाजिर कराने की अपेक्षा कर सकेगा। ऐसे साक्षियों का व्यय अभियुक्त को वहन करना होगा। (धारा 243)(ख) पुलिस रिपोर्ट से भिन्न आधार पर संस्थितं वारन्ट मामलों में विचारण की प्रक्रिया – दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 244 से 247 तक में पुलिस रिपोर्ट से भिन्न आधार पर संस्थित वारन्ट केस (Warrant Case) में विचारण की प्रक्रिया का उल्लेख किया गया है। वस्तुतः पुलिस रिपोर्ट पर संस्थित वारन्ट मामलों तथा पुलिस रिपोर्ट से भिन्न आधार पर संस्थित वारन्ट मामलों में विचारण की प्रक्रिया लगभग एक समान ही है। ऐसे मामलों में भी अभियुक्त को मामले तथा उससे सम्बन्धित दस्तावेजों की प्रतिलिपियाँ देने से लेकर निर्णय तक उसी प्रक्रिया का अनुसरण किया जाता है जिसका पुलिस रिपोर्ट पर संस्थित वारन्ट मामलों में किया जाता है। अन्तर केवल यही है कि ऐसे मामलों में संहिता की धारा 244 के अन्तर्गत आरोप विरचित किये जाने से पूर्व अभियोजन पक्ष की साक्ष्य लेखबद्ध की जाती है। इसे 'आरोप पूर्व की साक्ष्य' (Evidence before charge) कहा जाता है। ऐसी साक्ष्य लेखबद्ध करने के पश्चात् ही आरोप विरचित किये जाने के प्रश्न पर विचार किया जाता है। Read More This Post - वारन्ट केस क्या है सी.आर.पी.सी. के अन्तर्गत वारन्ट मामलों का विचारण Read the full article
सम्मन केस से आप क्या समझते है इसके विचारण की प्रक्रिया को समझाइये
प्रकृति एवं प्रक्रिया की दृष्टि से आपराधिक मामलों को दो भागों में वर्गीकृत किया गया है - (क) समन केस (Summons Case) (ख) वारन्ट केस (Warrant Case) समन केस की परिभाषा Definition Summons Case - समन केस की परिभाषा दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 2 (ब) में दी गई है। इसके अनुसार - "समन मामला से ऐसा मामला अभिप्रेत है जो किसी अपराध से सम्बन्धित है तथा जो वारन्ट मामला नहीं है।" वारंट मामलों के अंतर्गत मृत्यु दण्ड या आजीवन कारावास, या दो वर्ष से अधिक की अवधि के कारावास से दण्डनीय मामले आते है इस प्रकार वे मामले जो दो वर्ष तक की अवधि के कारावास अथवा अर्थदण्ड अथवा दोनों से दण्डनीय किसी अपराध से सम्बन्धित है समन केस के अधीन आते है। इस आलेख में मुख्य जोर समन केस की प्रक्रिया (the process of trial of summons case) पर दिया गया है। समन मामले में प्रक्रिया के सामान्य चरण अन्य विचारण के समान होते है, लेकिन यह विचारण त्वरित उपचार के लिए कम औपचारिक होता है। समन केस में विचारण की प्रक्रिया – समन मामलों में विचारण की प्रक्रिया का उल्लेख संहिता की धारा 251 से 259 में किया गया है। इनके अनुसार समन मामलों में विचारण की प्रक्रिया इस प्रकार है - (1) अभियोग का सारांश सुनाया जाना - दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 251 जब किसी समन मामले में अभियुक्त को मजिस्ट्रेट के समक्ष लाया जाता है या वह मजिस्ट्रेट के समक्ष हाजिर होता है तब सर्वप्रथम उसे उस अपराध की विशिष्टियाँ बताई जायेगी, जिसका उस पर अभियोग है और उससे यह पूछा जायेगा कि वह दोषी होने का अभिवाक् करता है अथवा प्रतिरक्षा करना चाहता है। (2) दोषी होने के कथन पर दोषसिद्ध किया जाना – दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 252 के तहत अपराध की विशिष्टियाँ - सुनने के पश्चात् यदि अभियुक्त अपने दोषी होने का अभिवाक् अर्थात् कथन करता है। तो मजिस्ट्रेट द्वारा उसके कथनों को उसी के शब्दों में लेखबद्ध किया जायेगा और उसे स्वविवेकानुसार दोषसिद्ध किया जायेगा(3) साक्ष्य लेखबद्ध किया जाना – जब अभियुक्त द्वारा अपने दोषी होने का कथन नहीं किया जाता है और वह विचारण चाहता है तब सर्वप्रथम अभियोजन की तथा तत्पश्चात् प्रतिरक्षा (defence) की साक्ष्य लेखबद्ध की जायेगी।(4) दोषसिद्धि या दोषमुक्ति का निर्णय – अभियोजन एवं अभियुक्त की साक्ष्य लेने के पश्चात् यदि मजिस्ट्रेट इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि अभियुक्त दोषी नहीं है तो उसे 'दोषमुक्त' (acquity) कर दिया जायेगा।संहिता की धारा 255 के तहत यदि मजिस्ट्रेट यह पाता है कि अभियुक्त दोषो है तो उसे 'दोषसिद्ध' (convict) घोषित करते हुए दण्डादेश पारित कर सकेगा (5) परिवादी के हाजिर नहीं होने का प्रभाव – संहिता की धारा 256 में यह उपबंध किया गया है कि यदि सुनवाई के लिए नियत किसी दिन परिवादी न्यायालय में उपस्थित नहीं होता है तो मजिस्ट्रेट द्वारा उसका परिवाद खारिज करते हुए अभियुक्त को दोषमुक्त घोषित किया जा सकेगा, बशर्ते कि ऐसे मामले की सुनवाई को अन्य किसी दिन के लिए स्थगित किया जाना वह उचित नहीं समझे।(6) परिवाद का वापस लिया जाना – दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 257 के अन्तर्गत परिवादी मामले में निर्णय सुनाये जाने से पूर्व कभी भी परिवाद को अभियुक्त के विरुद्ध और यदि एकाधिक अभियुक्त है तो उन सबके विरुद्ध या उनमें से किसी के विरुद्ध वापस ले सकेगा। परिवाद को ऐसे वापस लिये जाने का प्रभाव अभियुक्त को दोषमुक्ति होगा।Read More This Post - समन केस के विचारण की प्रक्रिया को समझाइये Read the full article
संज्ञेय अपराध में अन्वेषण की प्रक्रिया तथा पुलिस अधिकारी की शक्तिया एंव कर्त्तव्य
आपराधिक न्याय प्रशासन में प्रथम सूचना रिपोर्ट तथा अन्वेषण (अनुसंधान/जाँच) का महत्त्वपूर्ण स्थान है। जाँच/अनुसंधान की प्रक्रिया प्रथम सूचना रिपोर्ट के पश्चात् प्रारम्भ होता है और जिसके द्वारा विचारण के लिए साक्ष्य एकत्रित की जाती है अर्थात् यह सुनिश्चित किया जाता है कि अभियुक्त के विरुद्ध प्रथम दृष्ट्या मामला बनता है या नहीं। संज्ञेय अपराध में अन्वेषण की प्रक्रिया - जैसा की हम जानते है कि, प्रथम सूचना रिपोर्ट के साथ ही अनुसंधान/अन्वेषण की प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाता है और असंज्ञेय अपराध के सम्बन्ध में अनुसंधान प्रारम्भ करने से पूर्व मजिस्ट्रेट के आदेश की आवश्यकता होती है लेकिन संज्ञेय मामलों में अन्वेषण प्रारम्भ करने के लिए मजिस्ट्रेट के आदेश की आवश्यकता नहीं होती। पुलिस अधिकारी की शक्तियां एंव कर्तव्य / अन्वेषण की प्रक्रिया – संज्ञेय मामलों में जाँच/अन्वेषण की प्रक्रिया का वर्णन दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 156 से 173 तक में किया गया है। संहिता की धारा 156 भारसाधक पुलिस अधिकारी को किसी संज्ञेय मामले का अन्वेषण मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना किये जाने की शक्तियाँ प्रदान करती है। लेकिन फिर भी पुलिस अन्वेषण नहीं करती है तब मजिस्ट्रेट धारा 159 के तहत अन्वेषण के लिए आदेश कर सकता है। मजिस्ट्रेट को रिपोर्ट की प्रति भेजना - ज्योंही पुलिस अधिकारी के पास प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज होती है, अविलम्ब उसकी एक प्रति विहित वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के माध्यम से संज्ञान लेने के लिए सशक्त मजिस्ट्रेट के पास भेजी जायेगी। (धारा 157 एवं 158) घटनास्थल के लिए प्रस्थान - प्रथम सूचना रिपोर्ट प्राप्त होने पर भारसाधक अधिकारी स्वयं या उसका कोई अधीनस्थ अधिकारी – (क) मामले के तथ्यों एवं परिस्थितियों का अन्वेषण करने, (ख) अपराधी का पता चलाने, (ग) उसकी गिरफ्तारी का उपाय करने के लिए घटनास्थल पर जायेगा। (धारा 157) साक्षियों की परीक्षा - संहिता की धारा 160 के अन्तर्गत अन्वेषण अधिकारी किसी व्यक्ति को साक्ष्य हेतु अपने समक्ष हाजिर होने की अपेक्षा कर सकेगा, लेकिन निम्नांकित साक्षियों को अपने समक्ष हाजिर होने का आदेश उनके निवास स्थान से भिन्न स्थान के लिए नहीं दिया जा सकेगा (क) यदि वह 15 वर्ष से कम आयु का पुरुष है, अथवा (ख) कोई स्त्री है, अथवा (ग) वह 65 वर्ष से अधिक आयु का है, अथवा (घ) वह किसी शारीरिक या मानसिक रूप से निःशक्त व्यक्ति है। "इस उपधारा के अधीन किया गया कथन श्रव्य-दृश्य इलैक्ट्रानिक साधनों द्वारा भी अभिलिखित किया जा सकेगा।" संस्वीकृतियों एवं कथनों को अभिलिखित करना – अन्वेषण की प्रक्रिया के दौरान यदि कोई अभियुक्त मजिस्ट्रेट के समक्ष संस्वीकृति (confession) करना चाहे अथवा कोई साक्षी बयान (statement) देना चाहे तो अन्वेषण अधिकारी द्वारा विहित रीति से ऐसे अभियुक्त अथवा व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जायेगा और धारा 164 के तहत मजिस्ट्रेट द्वारा ऐसे कथनों को यथाविधि लेखबद्ध किया जायेगा। पुलिस अधिकारी द्वारा तलाशी - संहिता की धारा 165 के अधीन अन्वेषण के दौरान पुलिस अधिकारी द्वारा किसी ऐसे स्थान की तलाशी ली जा सकेगी जहाँ अपराध से सम्बन्धित किसी चीज के पाये जाने की सम्भावना है। ऐसी तलाशी के दौरान पाई जाने वाली चीजों (वस्तुओं) की सूचियाँ तैयार की जायेगी तथा उसकी एक प्रति उस व्यक्ति को दी जायेगी जिसके स्थान की तलाशी ली गई है। अभियुक्त को मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाना - जब अन्वेषण की प्रक्रिया 24 घंटे में पूरा नहीं हो सकता हो, तब गिरफ्तार किये गये व्यक्ति को निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जायेगा और 24 घंटे के पश्चात ऐसे व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के आदेश से ही अभिरक्षा (Police Custody) में रखा जा सकेगा। इसे 'रिमाण्ड' भी कहा जाता है। अन्वेषण की रिपोर्ट - संहिता की धारा 168 के तहत - जब अन्वेषण पूरा हो जाता है तब अन्वेषण अधिकारी द्वारा उसकी रिपोर्ट पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी को की जायेगी। अभियुक्त को छोड़ा जाना - अन्वेषण अधिकारी को प्रकरण के विचारण में अभियुक्त के विरुद्ध कोई साक्ष्य नहीं मिलता है या अपर्याप्त साक्ष्य है या संदेह का उचित आधार नहीं है जिससे की अभियुक्त को मजिस्ट्रेट के पास भेजा जाए उस दशा में ऐसा अधिकारी संहिता की धारा 169 के तहत अभियुक्त को समुचित बंध पत्र निष्पादित करने पर छोड़ देगा| आरोप-पत्र पेश करना – संहिता की धारा 173 के अन्तर्गत अन्वेषण पूरा हो जाने पर अभियुक्त के विरुद्ध न्यायालय में आरोप-पत्र पेश किया जाता है, इसे 'चालान' अथवा 'चार्ज शीट' भी कहा जाता है। इसमें निम्नांकित बातों का उल्लेख किया जायेगा - (क) पक्षकारों के नाम, (ख) इत्तिला का स्वरूप, (ग) मामले की परिस्थितियों से परिचित प्रतीत होने वाले व्यक्तियों के नाम, (घ) क्या कोई अपराध किया गया प्रतीत होता है और यदि किया गया प्रतीत होता है तो किसके द्वारा, (ङ) क्या अभियुक्त गिरफ्तार कर लिया गया है, (च) क्या उसे प्रतिभूओं सहित या रहित बंधपत्र पर छोड़ दिया गया है, (छ) क्या वह धारा 170 के अन्तर्गत अभिरक्षा में भेज दिया गया है, आदि। (ज) जहाँ अन्वेषण भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 376, धारा 376क, धारा 376कख, धारा 376ख, धारा 376ग या धारा 376घ, धारा 376घक, धारा 376घख के अधीन किसी अपराध के सम्बन्ध में है, वहाँ क्या स्त्री की चिकित्सा परीक्षा की रिपोर्ट संलग्न की गई है। (झ) बालिका के साथ बलात्संग के सम्बन्ध में अन्वेषण उस तारीख से जिसको पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी द्वारा इत्तिला अभिलिखित की गई थी, तीन मास के भीतर, पूरा किया जाएगा।Read More This Post - संज्ञेय अपराध में पुलिस अधिकारी के कर्त्तव्य तथा उसकी जांच की प्रक्रिया का उल्लेख Read the full article
आरोपों का संयोजन एंव इसके अपवाद | धारा 218 से 223 CrPC in Hindi
आरोपों का संयोजन | Joinder of charges वास्तविक रूप से आरोप से ही मुकदमे की कार्यवाही (विचारण) की शुरुआत होती है, संहिता की धारा की धारा 211 से 217 आरोपों को तैयार करने से सम्बंधित है और धारा 218 से धारा 223 आरोपों का संयोजन से सम्बंधित है, जिसमे यह बताया गया है कि, इस संहिता के अधीन अभियुक्त पक्षकार पर कब और कोनसे अपराधों के लिए एक साथ आरोप लगाये जा सकते है एंव उनका विचारण किया जा सकता है| सुभिन्न अपराधों के लिए पृथक आरोप - यह एक महत्त्वपूर्ण विषय है कि, कब कई आरोपों का एक साथ विचारण किया जा सकता है, क्योंकि दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 218 में यह कहा गया है कि - "प्रत्येक सुभिन्न अपराध के लिए, जिसका किसी व्यक्ति पर अभियोग है, पृथक् आरोप होगा और ऐसे प्रत्येक आरोप का पृथकतः विचारण किया जायेगा”। उदाहरण के लिए - क पर एक स्थान पर चोरी करने एंव किसी दुसरे स्थान पर घोर उपहति कारित करने का अभियोग लगाया जाता है| यहाँ क पर चोरी व घोर उपहति कारित करने के लिए पृथक्-पृथक् आरोप लगा कर उनका अलग अलग विचारण करना होगा| धारा 218 आज्ञापक है और प्रत्येक भिन्न अपराध के लिए उन मामलों को छोड़कर जो संहिता में विनिर्दिष्ट किए गए हैं, अलग-अलग आरोप होना चाहिए। जहाँ एक ही रात मे दो घरों में दो डकैती हुई है। वहाँ दोनों डकैतियों को मिलाकर एक ही आरोप में दोनों को नहीं समेटना चाहिए। धारा 218 के अपवाद (आरोपों का संयोजन) - इस धारा के कुछ अपवाद है जिनमे मामलों अथवा परिस्थितियों के तहत अभियुक्त पर एक से अधिक अपराध का एक साथ आरोप लगाया जाकर उनका एक साथ विचारण किया सकता है, ऐसे मामले अथवा परिस्थितियाँ निम्नांकित है - एक ही वर्ष में एक ही किस्म के तीन अपराध - इस संहिता की धारा 219 के अनुसार एक ही वर्ष में एक ही किस्म के तीन अपराधों का एक साथ आरोप लगाया जा सकता है और उनका एक साथ विचारण किया जा सकता है। स्टेट बनाम मोतीसिंह के प्रकरण अनुसार तीन से अधिक अपराधों का न तो एक साथ आरोप लगाया जा सकेगा और न ही उनका एक साथ विचारण किया जा सकेगा। (ए. आई. आर. 1962, राजस्थान 35) एक ही संव्यवहार में किये गये एकाधिक अपराध - सर जेम्स स्टीफेन ने एक संव्यवहार को एक तथ्यों के समूह के रूप में परिभाषित किया है, जो इस तरह एक दुसरे से जुड़े होते है कि उन्हें एक नाम यथा अपराध, संविदा, दोष, खोज की विषय वस्तु जो प्रश्नगत है, से पुकारा जाता है|दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 220 (1) के अनुसार - यदि परस्पर सम्बद्ध ऐसे कार्यों के, जिनसे एक ही संव्यवहार बनता है, एक क्रम में एक से अधिक अपराध एक ही व्यक्ति द्वारा कारित किये गये हैं तो ऐसे प्रत्येक अपराध के लिए एक ही विचारण में उस पर आरोप लगाया जा सकेगा और उन सभी का एक साथ विचारण किया जा सकेगा। दुर्विनियोग एवं लेखाओं के मिथ्याकरण के लिए संयुक्त आरोप - सीआरपीसी की धारा 220 (2) के अनुसार - जहाँ किसी व्यक्ति पर आपराधिक न्यास भंग या सम्पत्ति के बेईमानीपूर्वक दुर्विनियोग के अपराधों को सुकर बनाने के लिए लेखाओं के मिथ्याकरण के एकाधिक अपराधों का अभियोग हो, वहाँ ऐसे प्रत्येक अपराध के लिए एक ही विचारण में उस पर आरोप लगाते हुए उनका विचारण किया जा सकेगा।एकाधिक परिभाषाओं में आने वाले अपराध - सीआरपीसी की धारा 220 (3) के अनुसार - यदि अभिकथित कार्य किसी ऐसे अपराध का गठन करता है जो विधि की एकाधिक परिभाषाओं में आता हो तो अभियुक्त ऐसे अपराधों में से प्रत्येक के लिए एक ही विचारण में आरोपित किया जा सकेगा।कई कार्यों से गठित भिन्न अपराध - सीआरपीसी की धारा 220 (4) के अनुसार - जब अनेक कार्यों की श्रृंखलाओं से मिलकर कोई अपराध गठित होता हो और ऐसे कार्यों में से प्रत्येक कार्य स्वयं सुस्पष्ट अपराध का गठन करता है या ऐसे कार्यों के समूह से अन्य दूसरे अपराधों का गठन होता है, तब ऐसे सभी अपराधों को एक साथ आरोपित करते हुए उनका विचारण किया जा सकेगा।इस प्रकार यह एक समर्थकारी व्यवस्था है जो न्यायालय को अनेक अपराधों का एक साथ विचारण करने की शक्तियाँ प्रदान करती है। (मोहिन्दर सिंह बनाम स्टेट ऑफ पंजाब, ए. आई. आर. 1999 एस. सी 211) और अधिक जाने - आरोप के संयोजन एवं आरोप की विरचना क्या है? जानिए इसके कानूनी प्रावधान Read the full article