दोहरे दंड से क्या अभिप्राय है | Double Jeopardy in hindi और इसके प्रमुख अपवाद
दोहरे खतरे से संरक्षण (Double Jeopardy) - भारतीय दाण्डिक विधि का यह महत्वपूर्ण सिद्वान्त है कि, किसी भी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए दुबारा जोखिम में नहीं डाला जा सकता। (A person can not be put into peril twice the same offence) भारतीय संविधान के अनुच्छेद 20 (2) में यह प्रावधान किया गया है कि - "किसी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए एक बार से अधिक अभियोजित और दण्डित नहीं किया जायेगा।" इसे 'दोहरे दण्ड से संरक्षण' अथवा 'दोहरे खतरे से संरक्षण' (Double Jeopardy) का सिद्धान्त के नाम से भी जाना जाता है| यह सिद्धान्त Nemo debet lis vexare procodem सूत्र पर आधारित है इसे दुसरे शब्दों में Nemo debet vis vexari भी कहा गया है यानि किसी भी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए दो बार न तो अभियोजित किया जा सकता है और न ही दण्डित। दोहरे खतरे से संरक्षण धारा 300 में अन्तर्निहित सिद्धान्त – संहिता की धारा 300 में कहा गया है कि - "एक बार दोषसिद्ध या दोषमुक्त किये गये व्यक्ति का उसी अपराध के लिए दुबारा विचारण नहीं किया जायेगा।" संहिता की धारा 300 की उपधारा (1) का मूल सार यह है कि – जिस व्यक्ति का किसी अपराध के लिए सक्षम अधिकारिता वाले न्यायालय द्वारा एक बार विचारण किया जा चुका है और जो ऐसे अपराध के लिए दोषसिद्ध या दोषमुक्त किया जा चुका है, वह जब तक ऐसी दोषसिद्धि या दोषमुक्ति प्रवृत्त रहती है, तब तक न तो उसी अपराध के लिए विचारण का भागी होगा और न उन्हीं तथ्यों पर किसी ऐसे अन्य अपराध के लिए विचारण का भागी होगा जिसके लिए उसके विरुद्ध लगवाये गये आरोप से भिन्न आरोप धारा 221 की उपधारा (1) के अधीन लगाया जा सकता था और जिसके लिए वह उसकी उपधारा (2) के अधीन दोषसिद्ध किया जा सकता था। उदाहरण - ख के आपराधिक मानव वध के लिए क पर सेशन न्यायालय के समक्ष आरोप लगाया जाता है और वह दोषसिद्ध किया जाता है। यहाँ ख की हत्या के लिए क का उन्हीं तथ्यों पर तत्पश्चात् विचारण नहीं किया जा सकता है। दोहरे खतरे से संरक्षण की आवश्यक शर्तें – संहिता की धारा 300 के प्रावधानों का लाभ लेने के लिए निम्नलिखित शर्तों का पूरा होना जरुरी है - (1) अभियुक्त किसी अपराध के लिए विचारित किया जाकर एक बार दोषसिद्ध या दोषमुक्त किया जा चुका हो, (2) उस अपराध के लिए जिसके लिए उसके विरुद्ध लगाये गये आरोप से भिन्न आरोप धारा 221 की उपधारा (1) के अधीन लगाया जा सकता था और जिसके लिए वह उपधारा (2) के अधीन दोषसिद्ध किया जा सकता था, उसी अपराध के लिए नया विचारण आरम्भ किया गया हो; (गवर्नमेन्ट ऑफ बम्बई बनाम अब्दुल वहाब, ए. आई. आर. 1946 बम्बई 38 ) एंव (3) प्रथम विचारण किसी सक्षम न्यायालय द्वारा किया गया हो। (बी. एम. रतनवेलू बनाम के. एस. अय्यर, ए. आई. आर. 1933, मद्रास 765) दोहरे खतरे से संरक्षण के अपवाद – धारा 300 में प्रतिपादित सिद्धान्त निरपेक्ष सिद्धान्त नहीं है। इसके कुछ अपवाद भी हैं अर्थात् कतिपय परिस्थितियों में किसी व्यक्ति का उन्हीं तथ्यों पर दुबारा विचारण किया जा सकता है। यह अपवाद निम्नलिखित है - (i) राज्य सरकार की सहमति से पुनः विचार - उपधारा (2) में यह कहा गया है कि किसी अपराध के लिए दोषसिद्ध या दोषमुक्त किये गये व्यक्ति का, उस भिन्न अपराध के लिए, जिस पर धारा 220 (1) के अन्तर्गत प्रथम विचारण के समय ही पृथक् आरोप लगाया जा सकता था, बाद में राज्य सरकार की सहमति से विचारण किया जा सकेगा। (ii) भिन्न परिणाम पैदा होने पर विचारण – उपधारा (3) में यह कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति ऐसा कोई अपराध करता है जो कि अनेक कार्यों से निर्मित हुआ है और उसको किसी एक कार्य के लिए दोषसिद्ध या दोषा त किया जा चुका है, तो बाद में यदि उस कार्य के परिणाम से कोई भिन्न अपराध गठित होता है तो उस भिन्न अपराध के लिए उसका विचारण किया जा सकेगा।(iii) पूर्व न्यायालय के सक्षम नहीं होने पर विचारण – उपधारा (4) में यह उपबंधित किया गया है कि-यदि किसी व्यक्ति को किन्हीं कार्यों से गठित किसी अपराध के लिए दोषसिद्ध या दोषमुक्त किया गया है, फिर भी उस पर उन्हीं कार्यों से गठित किसी अन्य अपराध के लिए आरोप लगाया जा सकेगा और उसका विचारण किया जा सकेगा, बशर्ते कि वह न्यायालय जिसके द्वारा प्रथम विचारण किया गया था, बाद वाले आरोप को सुनने के लिए सक्षम नहीं रहा हो।Read More This Post - दोहरे दंड से क्या अभिप्राय है | Double Jeopardy in hindi Read the full article















