मां कौन थी?
बहुत वक़्त बाद रेलगाड़ी का सफर किया और महसूस किया कि वाकई सफर काफी-कुछ सिखाता है। खिड़की से बाहर दौड़ते खेत, पेड़, और धूप-छांव की लुका-छुपी के बीच, डिब्बे के भीतर भी एक अलग ही कहानी चल रही होती है। और इस बार मैं... खिड़की के उस पार देखते हुए भी, अपने भीतर कुछ महसूस कर रही थी।
तभी सामने की बर्थ पर एक परिवार आकर बैठा। एक महिला, और दो छोटी बच्चियाँ। गोद में, नन्ही सी, शायद यही कोई डेढ़ साल की और दूसरी कुछ बड़ी, पर फिर भी बहुत छोटी, कोई साढ़े तीन साल की होगी।
मां थोड़ी परेशान लग रही थी, शायद बच्चों के साथ अकेले पहला सफर था । लेकिन उसकी कुछ बड़ी, पर फिर भी बहुत छोटी बेटी जैसे उसकी थकान पढ़ पा रही थी। परदों की ओट और मेरी नींद की पसरती चादर के उहापोह में मेरे कानों में पड़े कुछ शब्द
"मम्मा, मैं चादर बिछा देती हूँ..."
"इसे डांटिए मत न, ये छोटी है ये अभी समझती नहीं है..."
"मैं इसे खिलाऊंगी, आप खा लो मम्मा..."
और तब मैंने पहली बार गौर किया कि वो जो बड़ी बच्ची है वो असल में कितनी छोटी है! जिसकी ऊंचाई अभी सीट तक भी नहीं पहुंचती है और फिर भी कितनी 'बड़ी' लगती है जैसे किसी और जन्म की परिपक्वता साथ लाई हो। उसकी आंखों में ममता नहीं, ज़िम्मेदारी थी। उसका स्पर्श एक मां जैसा था। उसकी मुस्कान में वो धैर्य था, जो अक्सर उम्र के साथ आता है।
छोटी बहन बार-बार उसे चिढ़ा रही थी, खिलौने छीन रही थी, तुनक रही थी। मगर वह हर बार मुस्कुरा देती कभी चुपके से उसके गाल सहला देती, तो कभी मम्मी को आंखों से ही रोक देती।
मैं बस देखती रही। कोई नाम नहीं दिया उस एहसास को, कोई शब्द नहीं।
कुछ स्टेशनों बाद वे उतर गए। जाते-जाते, वो बड़ी सी छोटी बच्ची मेरी ओर मुड़ी उसकी आंखों में थकान थी, पर संतोष भी। जैसे उसने इस सफ़र में अपना काम पूरा कर दिया हो।
मैं खिड़की से उन्हें दूर जाते देखती रही। मां गोद में बच्ची को थामे चल रही थी... और पीछे-पीछे, छोटी मां कहूँ या बड़ी बहन।
मेरा सफर अब भी बाकी था। और मन में एक सवाल रह गया इस पूरी यात्रा में मां कौन थी?
-Sh00nya
















