चाय का प्याला हो
या महबूबा की कमर,
मेरा हाथ हमेशा
उस बीच के पतले ढलान तक चला जाता है।
शायद यही मेरी फितरत है।
क्योंकि चीज़ों की असली नज़दीकी
किनारों पर नहीं मिलती।
चाय की गर्माहट भी
उसे बीच से थामने पर
हथेलियों में उतरती है।
और महबूबा..
वो भी कमर के उसी ढलान से पकड़ो
तो ज़रा और करीब आ जाती है।
जैसे रिश्तों की गहराई
शब्दों से नहीं,
पकड़ की जगह से तय होती हो।
कुछ लोग किनारों को पकड़ते हैं,
ताकि गिरने का डर कम रहे।
मगर मुझे हमेशा
वो जगह थामना पसंद है
जहाँ किसी का संतुलन बसता है,
जहाँ छूना सिर्फ छूना नहीं,
बल्कि पूरी मौजूदगी को महसूस करना होता है।
| shyam










