कहाँ था घर? कैसा था? ढूंढते ढूंढते थकी भी नहीं थी, क्यूंकि जानती थी वह कि अंत-परंत उसे घर मिल ही जायेगा| और जब घर मिल जायेगा तो उसे अपनी थकान दूर करने का एक ज़रिया भी तो मिल जायेगा|
घर| घर दीवारों का ही हो यह अनिवार्य नहीं है| ऐसा उसका मानना था| बस उसका होना, घर का, ज़रूरी था|
सुबह-सवेरे मिली चाय की पहली चुस्की किसी चुम्बन से कम नहीं होती| यही चुस्की आरामदायक बिस्तर में ली जाए, तो वो बिस्तर घर हो जाता है| बशर्ते चाय साथ हो| अदरक-तुलसी वाली चाय| नहीं तो वह महमान की पिलाई हुई चाय लगेगी और फिर बिस्तर भी मेहमानों का ही समझा जायेगा| एक पुरानी टी-शर्ट भी घर हो सकती थी अगर उसमें लिपटकर वैसा ही आराम मिल सकता था जैसा अपने प्रिय की बाहों में लिपटकर मिल जाता है| अरे, प्रिय की बाहों में होना भी तो घर होना ही होता है! ऐसी बाहें जिन में धंस जाएँ, आँखें मूँद लें, और सो जाएं|
कहीं भी था घर| इसीलिए उसके आखिर में मिल ही जाने का आश्वासन था|
दिक्कत बस इतनी थी कि हर ज़रा सी देर में घर गायब हो जाता था| देर से हो तो मुआफी भी मिल जाए| खैर, मुआफी तो तब मिले जब घर को कोई शर्म हो अपने गायब हो जाने की या फिर हमदर्दी हो उसके साथ हमेशा-हमेशा के लिए न हो पाने की| इतनी जल्दी जल्दी लुप्त हो जाना, घर का, टी-शर्ट का, चाय की चुस्की का, बाँहों के आराम का, उन्हें घर नहीं होने देता था| मानो जब तक घरेलु लगने लगते, चल बसते थे|
एक घर के चल बसने का मतलब था दूसरे घर को ढूंढना| यही उसकी थकान का कारण हो सकता था| पर ऐसा हुआ नहीं| वो नहीं थकी|
उसने सोचा, वो ख़ुद ही घर हो जाएगी|