सह अपराधी किसे कहते है? क्या न्यायालय सह अपराधी के कथन के आधार पर दण्डादेश पारित कर सकता है?
सह अपराधी परिचय - समाज में कुछ लोग अपराध कारित करने मे अपना षड्यंत्रपूर्वक आशय रखते है और निर्दयता से उस अपराध को पूरा करते है तथा कोई भी ऐसी निशानी नहीं छोड़ते जो साक्ष्य बन सके| इसलिए सामान्यता पुलिस उनमे से किसी एक या अधिक को इस शर्त के साथ की वह अपने साथियों के खिलाफ साक्ष्य देगा, उसे सह अपराधी कहा जाता है और वह सरकारी गवाह बन जाता है तथा उसे क्षमा कर दिया जाता है| ऐसा सह अपराधी उन व्यक्तियों के खिलाफ गवाही देता है जिनके साथ मिलकर उसने अपराध किया था| अपराधी मुख्यतया दो प्रकार (i) मुख्य अपराधी एवं (ii) सह अपराधी होते है और दाण्डिक विधि के अन्तर्गत दोनों दण्डनीय माने जाते हैं। अधिकांश अपराधों में यह दोनों प्रकार के अपराधी शामिल रहते है। सह अपराधी कौन होता है? – सह अपराधी ऐसे व्यक्ति को कहा जाता है जिसने किसी अपराध को घटित करने में अन्य अपराधियों के साथ भाग लिया हो यानि जब दो या दो से अधिक व्यक्ति मिलकर किसी अपराध को करते है तब उन सभी व्यक्तियों को सह अपराधी कहा जाता है| सह अपराधी होने के लिए किसी व्यक्ति को उसी अपराध के किये जाने में भाग लेना आवश्यक है और ऐसा भाग लेना प्रेरक, सहयोगी अथवा सह अपराधी के रूप में हो सकता है| भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 में सह – अपराधी की परिभाषा नहीं दी गई है, लेकिन धारा 133 में सह-अपराधी की साक्ष्य के बारे में प्रावधान किया गया है। ऐसी स्थिति में सह-अपराधी की साधारण परिभाषा ही करनी होगी। परिभाषा – सह अपराधी वह व्यक्ति होता है जो अपराध करने में बराबर साथ रहता है, सह–अपराधी शब्द में अपराध में साथ साथ दोषी होना विदित होता है| इसी तरह घूस लेना अपराध है और जो किसी लोक अधिकारी को घूस देने का प्रस्ताव देता है, वह सह–अपराधी होता है| इस प्रकार अपराध कारित करने में सह – अपराधी के लिए निम्न बातें आवश्यक है - (क) उसका अपराध में भाग लेना, या (ख) अपराध में सहयोग करना, या (ग) अपराध का दुष्प्रेरण करना, आदि। सह – अपराधी की साक्ष्य का क्या महत्त्व है - हमारे सामने कई बार प्रश्न आता है कि क्या सह–अपराधी की साक्ष्य का महत्त्व है? अथवा क्या सह–अपराधी की साक्ष्य पर न्यायालय दण्डादेश दे जा सकता है? भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 133 में हमें इस प्रकार जे सभी प्रश्नों का उत्तर मिलता है। धारा 133 के अनुसार सामान्य नियम यह है कि - (i) सह अपराधी, अभियुक्त व्यक्ति के खिलाफ सक्षम गवाह है, (ii) दोषसिद्वि इसलिए अवैध नहीं होगी कि वह सह अपराधी के असंपुष्ट परिसाक्ष्य के आधार पर की गई है| यहां असंपुष्ट परिसाक्ष्य का तात्पर्य यह है कि – सह अपराधी ने अभियुक्त के विरुद्ध साक्ष्य दिया है, जबकि अन्य साक्ष्यों के द्वारा सह अपराधी के साक्ष्य की पुष्टि नहीं की गई है| क्या सह –अपराधी की साक्ष्य की सम्पुष्टि आवश्यक है? - यद्यपि धारा 133 के अनुसार अभियुक्त की दोषसिद्धि के लिए सह –अपराधी की साक्ष्य की सम्पुष्टि आवश्यक नहीं है, लेकिन यदि धारा 114 के दृष्टान्त - (ख) के सन्दर्भ में देखें तो सह –अपराधी के साक्ष्य की सम्पुष्टि आवश्यक प्रतीत होती है। वर्तमान में न्यायालयों की भी यह धारणा बनने लगी है कि सह – अपराधी की साक्ष्य की पुष्टि होना आवश्यक है। मात्र सह–अपराधी की अपरिपुष्ट साक्ष्य के आधार पर अभियुक्त को दोषसिद्ध किया जाना सुरक्षित नहीं है। रामेश्वर कल्याण सिंह बनाम स्टेट ऑफ राजस्थान इस प्रकरण में अपीलार्थी (रामेश्वर कल्याण सिंह) पर एक आठ वर्षीय बालिका (पूरनी) के साथ बलात्कार करने का आरोप था। इसमें स्वयं उस बालिका का साक्ष्य और उसकी माता को किया गया कथन प्रश्नगत था। उच्चतम न्यायालय द्वारा यह कहा गया कि वह बालिका स्वयं साक्ष्य अधिनियम की धारा 118 के अन्तर्गत सक्षम साक्षी है और सह–अपराधी की साक्ष्य के आधार पर अभियुक्त को दोषसिद्ध किया जा सकता है, लेकिन सुरक्षा की दृष्टि से ऐसे साक्ष्य को विश्वसनीय बनाने के लिए किसी अन्य साक्ष्य द्वारा उसकी सम्पुष्टि अपेक्षित है। (1952 एस. सी. आर. 526) सह अपराधी के साक्ष्य की आवश्यकताएं – किसी भी प्रकरण में सह-अपराधी के साक्ष्य के आधार पर दोषसिद्धि करने के लिए निम्न बातें आवश्यक है - (i) सह अपराधी का साक्ष्य विश्वास के योग्य होना चाहिये, (ii) अपराध के साथ अभियुक्त का सम्बन्ध स्थापित करते हुए तात्विक विशिष्टियों में उसका साक्ष्य संपुष्ट किया जाना चाहिए, साधारण नियम यह है कि, सह-अपराधी के परिसाक्ष्य में संपुष्टि की आवश्यकता सदैव रहती है जिस कारण सह-अपराधी के साक्ष्य की सम्पुष्टि का नियम अब एक विधिक नियम बन गया है| Read More - INDIAN EVIDENCE ACT 1872 सहअपराधी (ACCOMPLICE) धारा 133 Read the full article









