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RP 4 a by Upadhye Guruji
🔱 महादेव ने क्यों पिया हलाहल विष? – समस्त ब्रह्मांड को बचाने की कथा
🕉️ "जब समस्त ब्रह्मांड विनाश के कगार पर खड़ा था… जब अमृत की खोज विनाश का कारण बन गई थी… तब कौन था जिसने बिना सोचे-समझे समस्त संसार को बचाने का निर्णय लिया? आज हम जानेंगे – उस विष की कहानी, जिसे पीकर महादेव बने ‘नीलकंठ’।"
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🌊 अध्याय 1: देवता और दानव – एक साथ
बहुत समय पहले की बात है। संसार त्रिलोकी में बंटा हुआ था – स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल। देवता स्वर्ग में निवास करते थे, जबकि दानव पाताल में। पृथ्वी दोनों के कर्मक्षेत्र की तरह थी। एक समय ऐसा आया, जब इंद्र और अन्य देवता अपनी शक्तियां खोने लगे। असुर अधिक शक्तिशाली हो गए और देवताओं को हराने लगे।
देवताओं ने इस संकट का हल ढूँढने के लिए ब्रह्मा जी की शरण ली। ब्रह्मा जी ने कहा – “तुम्हें अमरता चाहिए, तो अमृत प्राप्त करना होगा। पर अमृत केवल समुद्र मंथन से ही निकलेगा।”
समुद्र मंथन! एक ऐसा कार्य जिसमें दोनों पक्षों को साथ मिलकर मंथन करना था – देवता और दानव मिलकर।
🐉 अध्याय 2: समुद्र मंथन की महागाथा
समुद्र मंथन के लिए मंदार पर्वत को मथानी और वासुकी नाग को रस्सी बनाया गया। मंथन की शुरुआत हुई। समुद्र में हलचल बढ़ी। सभी की निगाहें अमृत पर थीं। परंतु मंथन के प्रारंभ में जो निकला – वो था हलाहल विष।
यह कोई साधारण विष नहीं था। यह था – "त्रिलोक संहारक"। "सम्पूर्ण सृष्टि को पलभर में नष्ट कर देने वाला ज़हर।"
उस विष का प्रभाव इतना तीव्र था कि उसके निकास से ही आकाश काला हो गया, वायु जहरीली हो गई, जल खौलने लगा। देवता कांप उठे, असुर भयभीत हो गए।
☠️ अध्याय 3: हलाहल विष – जब ब्रह्मांड पर छा गया संकट
हलाहल विष की ऊष्मा इतनी तीव्र थी कि प्राणी मात्र तड़पने लगे। नदियाँ सूखने लगीं, सूर्य की किरणें मंद पड़ने लगीं। अग्नि शांत हो गई और वायु रुक गई। एक क्षण ऐसा लगा कि संपूर्ण सृष्टि समाप्त होने वाली है।
देवताओं ने विष्णु जी से प्रार्थना की – “हे नारायण! हमारी रक्षा करें!” विष्णु मुस्कराए और बोले – “यह कार्य केवल एक ही कर सकता है – भोलेनाथ।” “केवल महादेव के पास है वह क्षमता, जो इस विष को समाहित कर सकते हैं।"
🔔 अध्याय 4: कैलाश की ओर दौड़ पड़े देवता
देवता, ब्रह्मा, विष्णु, ऋषिगण – सभी कैलाश पर्वत की ओर दौड़े। शिव जी ध्यान में लीन थे, योग मुद्रा में स्थित। देवताओं ने विनती की – “हे देवाधिदेव! हे त्रिनेत्रधारी! कृपा करें! सृष्टि संकट में है।”
शिव जी ने नेत्र खोले। उनका चेहरा शांत था, पर आँखों में करुणा जल रही थी।
वो बोले – “यदि विष सबको मार सकता है, तो मैं उसे स्वयं में समाहित कर लूँगा। सृष्टि मेरी है, इसकी रक्षा मेरा धर्म है।”
💙 अध्याय 5: नीलकंठ का जन्म
शिव जी ने हलाहल विष अपने हाथ में लिया। उसे सूंघते ही चारों दिशाओं में गर्जना हुई। पार्वती जी चिंतित हो उठीं। शिव ने धीरे-धीरे वह विष अपने मुख में डाल लिया।
सारी सृष्टि स्तब्ध थी।
पर शिव ने विष को गले से नीचे नहीं जाने दिया। उन्होंने उसे वहीं रोक दिया – कंठ में।
और तभी से – उनका कंठ हो गया नीला। और वे कहलाए – नीलकंठ महादेव।
🔥 अध्याय 6: जब शिव तपने लगे
हलाहल विष की ऊर्जा इतनी तीव्र थी कि शिव का शरीर तपने लगा। उनके माथे से अग्नि की लपटें उठने लगीं। उनके गले से नीली आभा निकलने लगी।
सभी देवता व्याकुल हो उठे। कहीं शिव इस विष से पीड़ित न हो जाएं। पार्वती जी ने तुरंत उनके गले को थाम लिया, ताकि विष नीचे न जाए।
वहीं ऋषियों ने शिव पर चंदन लगाया, गंगाजल चढ़ाया, बेलपत्र अर्पित किए। शिव शांत थे – ध्यानस्थ, अडिग, अचल – जैसे स्वयं ब्रह्मांड स्थिर हो गया हो।
🕉️ अध्याय 7: विष का रहस्य – क्यों पिया शिव ने ही?
अब एक प्रश्न उठता है – "क्यों शिव ने ही हलाहल पिया?"
क्या विष्णु नहीं पी सकते थे?
क्या ब्रह्मा जी नहीं रोक सकते थे?
उत्तर है – शिव त्याग के प्रतीक हैं। वे संसार के ‘पालक’ नहीं, ‘संहारक’ हैं। संहार का अर्थ केवल विनाश नहीं, बल्कि बुराई, विष, मोह, अज्ञान और कष्ट का अंत।
केवल वही जो पूर्ण रूप से निर्लिप्त हो, जो मोह से परे हो – वही इस विष को धारण कर सकता था। और वह थे – भोलेनाथ।
🧘♂️ अध्याय 8: शिव – साक्षात करुणा
महादेव ने कभी अपनी महानता का प्रदर्शन नहीं किया। उन्होंने न पुरस्कार मांगा, न पूजा। जब ब्रह्मांड संकट में था, उन्होंने चुपचाप विष पिया।
उनका त्याग नायाब था। उनकी करुणा असीम थी। उनका संकल्प अडिग था।
इसलिए वे देवों के भी देव कहलाते हैं – महादेव।
📿 अध्याय 9: आज भी होती है पूजा नीलकंठ की
आज भी जब हम शिव को जल चढ़ाते हैं, बेलपत्र अर्पित करते हैं, तो यह केवल श्रद्धा नहीं – आभार है।
वह आभार उस क्षण का है जब एक दिव्य शक्ति ने संपूर्ण ब्रह्मांड को बचाने के लिए विष का प्याला पिया।
🌺 अध्याय 10: कथा से मिलने वाली सीख
🔹 त्याग का अर्थ है – स्वयं का कष्ट सहकर दूसरों की रक्षा करना। 🔹 शिव सिखाते हैं कि नेतृत्व दिखावे से नहीं, बलिदान से आता है। 🔹 वे बताते हैं कि जब संकट आये, तो पीछे नहीं हटना चाहिए।
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