Varaha Avatar Part 1 | Vishnu Avatar Hindi | धरती बची कैसे? 🔥#varaha
यह कथा केवल देव बनाम दानव की नहीं है,
यह कथा है अहंकार बनाम धर्म,
बल बनाम भक्ति,
और विनाश बनाम संरक्षण की।
हिरण्याक्ष का युद्ध केवल एक दैत्य का अंत नहीं,
बल्कि उस चेतावनी का उद्घोष है कि
जब शक्ति धर्म से विहीन हो जाती है,
तो स्वयं भगवान को अवतार लेना पड़ता है।
यह कथा हमें बताती है कि
युद्ध भी रंजक होना चाहिए,
परंतु उसका उद्देश्य धर्म की स्थापना हो।
अब आइए…
उस काल में चलें
जहाँ पृथ्वी काँप उठी थी,
जल उफन पड़े थे,
और स्वयं विष्णु ने
वराह का रूप धारण किया था…
अध्याय 1 : जब सृष्टि काँप उठी
उस काल में सृष्टि शांत नहीं थी।
तीनों लोक—स्वर्ग, मृत्युलोक और पाताल—किसी अनजाने भय से काँप रहे थे। दिशाएँ अपनी मर्यादा भूल चुकी थीं। आकाश में बादल बिना वर्षा के गर्जना कर रहे थे, मानो आने वाले विनाश की सूचना दे रहे हों। वायु कभी ठंडी, कभी दहकती हुई बहती थी। सूर्य का तेज क्षीण पड़ने लगा था और चंद्रमा की शीतलता भी व्याकुलता में बदल चुकी थी। यह कोई साधारण समय नहीं था—यह उस महाविपत्ति का प्रारंभ था, जिसका मूल एक असुर के गर्भ से उत्पन्न होने वाला था।
पृथ्वी माता के हृदय में असहनीय पीड़ा उठ रही थी। पर्वतों की चोटियाँ कंपन करने लगी थीं, नदियों का जल मार्ग बदल रहा था और समुद्र अपनी सीमाएँ लाँघने को व्याकुल हो उठा था। ऋषियों के आश्रमों में यज्ञों की अग्नि बार-बार बुझ जाती थी। मंत्रोच्चार में विघ्न आने लगे थे। देवताओं के मन में भी एक अदृश्य भय घर करने लगा था। वे एक-दूसरे से पूछ रहे थे—
“क्या सृष्टि पर कोई नया संकट आने वाला है?”
उसी समय ब्रह्मलोक में ब्रह्मा जी गहन ध्यान में लीन थे। उनके चतुर्मुख से वेदों की ध्वनि प्रवाहित हो रही थी, किंतु उनके मस्तक पर भी चिंता की रेखाएँ स्पष्ट थीं। उन्होंने नेत्र खोले और गंभीर स्वर में कहा—
“यह कंपन साधारण नहीं है। यह किसी महाअसुर के आगमन का संकेत है।”
धरती पर यह संकट यूँ ही नहीं आया था। इसका बीज बहुत पहले बोया जा चुका था—उस संध्या में, जब धर्म को लांघकर काम ने विवेक पर विजय पा ली थी।
वह संध्या काल था। सूर्य अस्त होने को था। समस्त देवगण संध्या-वंदन की तैयारी कर रहे थे। महर्षि कश्यप अपनी अग्निशाला में ध्यानस्थ थे। उन्होंने खीर की आहुति देकर भगवान नारायण का पूजन किया था और अब शुद्ध मन से गायत्री मंत्र का जप कर रहे थे। उस समय सृष्टि की मर्यादा अत्यंत पवित्र थी—यह समय संयम का था, साधना का था।
परंतु उसी क्षण दिति—दक्ष प्रजापति की पुत्री और कश्यप की पत्नी—कामातुर होकर वहाँ आ पहुँची। उसकी आँखों में पुत्र-प्राप्ति की तीव्र लालसा थी। उसने कोमल वचनों में कहा—
“हे आर्यपुत्र! मैं पुत्रवती होना चाहती हूँ। मेरी इच्छा पूर्ण कीजिए।”
कश्यप ने नेत्र खोलकर शांत किंतु दृढ़ स्वर में उत्तर दिया—
“हे प्रिये! यह समय उचित नहीं है। संध्या काल में भूतनाथ महादेव अपने गणों के साथ विचरण करते हैं। इस समय भोग धर्म के विरुद्ध है। एक प्रहर की प्रतीक्षा करो, तब तुम्हारी इच्छा अवश्य पूर्ण होगी।”
पर दिति विवेक खो चुकी थी। उसने अधीर होकर कश्यप के वस्त्र पकड़ लिए और बोली—
“यदि आज मेरी कामना पूर्ण नहीं हुई, तो मेरा हृदय टूट जाएगा।”
कश्यप क्षणभर मौन रहे। वे दैव की प्रबल इच्छा को समझ गए। उन्होंने मन ही मन नारायण को प्रणाम किया और धर्म के इस विचित्र विधान को स्वीकार कर लिया। किंतु उनके मुख से निकले शब्द भविष्य का भयानक संकेत थे—
“हे दिति, यह कर्म शुभ फल नहीं देगा।”
संध्या-वंदन पूर्ण कर जब कश्यप लौटे, तो उन्होंने दिति को काँपते हुए देखा। दिति ने भयभीत होकर कहा—
“हे स्वामी! यदि मैंने अपराध किया है, तो भूतनाथ शिव मेरे गर्भ की रक्षा करें।”
कश्यप का स्वर गंभीर हो उठा—
“हे दिति! तुमने असमय में भोग किया है। तुम्हारे गर्भ से दो महाभयंकर पुत्र उत्पन्न होंगे। वे तीनों लोकों को आतंकित करेंगे, धर्म का नाश करेंगे और अंततः स्वयं भगवान द्वारा मारे जाएँगे।”
दिति ने विनम्रता से उत्तर दिया—
“यदि उनका वध होना ही है, तो भगवान के हाथों ही हो। ब्राह्मण के शाप से नहीं।”
कश्यप ने उसे सांत्वना दी—
“तुम्हारा पश्चाताप तुम्हें पुण्य देगा। तुम्हारे वंश में एक महान भगवद्भक्त उत्पन्न होगा, जो तुम्हारे कुल का उद्धार करेगा।”
समय बीतता गया। और फिर वह क्षण आया, जब दिति के गर्भ से दो बालकों का जन्म हुआ—हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष।
उनके जन्म लेते ही सृष्टि काँप उठी।
आकाश में केतु-राहु सूर्य और चंद्र पर बार-बार आच्छादित होने लगे। उल्काएँ गिरने लगीं। नदियों का जल सूख गया। गायों के स्तनों से रक्त बहने लगा। सियार और उल्लू दिन-दहाड़े रोने लगे। स्वर्गलोक तक हिल उठा।
देवताओं ने भयभीत होकर ब्रह्मा जी से पूछा—
“हे पितामह! यह कैसा उत्पात है?”
ब्रह्मा ने गंभीर स्वर में कहा—
“यह जय-विजय का पतन है। यह वही पार्षद हैं, जिन्हें सनकादि ऋषियों का शाप मिला है। अब ये असुर योनि में जन्म लेकर सृष्टि को कंपाएँगे।”
धरती माता ने करुण पुकार की—
“हे नारायण! मेरा भार असह्य हो रहा है। अधर्म बढ़ रहा है।”
वैकुंठ में श्रीहरि ने नेत्र खोले। उनके मुख पर करुणा थी, किंतु नेत्रों में भविष्य की अग्नि। उन्होंने मंद स्वर में कहा—
“जब अधर्म सीमा लाँघता है, तब अवतार अनिवार्य हो जाता है।”
और उसी क्षण…
सृष्टि जान गई—
महायुद्ध अवश्यंभावी है।
अध्याय 2 : दिति का अपराध और दैत्य वंश की उत्पत्ति
सृष्टि का विधान बड़ा सूक्ष्म होता है। जब एक क्षण की अविवेकपूर्ण कामना जन्म लेती है, तो उसका परिणाम युगों तक समस्त लोकों को भोगना पड़ता है। दिति का अपराध भी ऐसा ही था—एक क्षण का अधैर्य, जिसने दैत्य वंश की आधारशिला रख दी। उस संध्या की छाया अभी तक सृष्टि के कण-कण में व्याप्त थी। पृथ्वी, आकाश और दिशाएँ उसी अशुभ कर्म के परिणाम को धीरे-धीरे प्रकट करने लगी थीं।
महर्षि कश्यप धर्म, तप और संयम के साक्षात् स्वरूप थे। उनके आश्रम में वेदों की ध्वनि गूँजती रहती थी। देव, दानव, गन्धर्व—सभी उनके ज्ञान और मर्यादा का सम्मान करते थे। किंतु दिति का हृदय उस दिन धर्म से विचलित हो उठा था। पुत्र-प्राप्ति की कामना ने उसके विवेक पर ऐसा आवरण डाल दिया कि उसने काल, मर्यादा और चेतावनी—तीनों को भुला दिया। वही क्षण आगे चलकर सृष्टि के लिए एक भयानक अध्याय बन गया।
संध्या काल में किए गए उस कर्म के बाद दिति का मन भय और पश्चाताप से भर उठा। गर्भ धारण करने के पश्चात वह बार-बार आकाश की ओर देखती और काँपते स्वर में प्रार्थना करती—
“हे भूतनाथ भगवान शंकर! आप मेरे अपराध को क्षमा करें। मेरा गर्भ सुरक्षित रहे। मैंने जो किया, वह अज्ञानवश किया।”
उसका शरीर काँपता था, नेत्र अश्रुओं से भरे रहते थे। वह जान चुकी थी कि उसका अपराध साधारण नहीं है।
जब महर्षि कश्यप संध्या-वंदन और स्नान के उपरांत लौटे, तो उन्होंने दिति को भयभीत अवस्था में देखा। वे उसके निकट आए और गंभीर स्वर में बोले—
“हे दिति! तुमने मेरी चेतावनी नहीं मानी। तुम्हारा चित्त कामवासना में डूबा रहा। यह समय संतानोत्पत्ति के लिए निषिद्ध था। अब जो होगा, वह सृष्टि के लिए कष्टकारी होगा।”
दिति ने चरणों में गिरकर कहा—
“हे स्वामी! यदि अपराध हुआ है तो मुझे दंड दीजिए, किंतु मेरी संतान को नष्ट न होने दीजिए।”
कश्यप का स्वर कठोर किंतु सत्य से भरा था—
“हे दिति! तुम्हारे गर्भ से दो महाभयंकर पुत्र उत्पन्न होंगे। वे अधर्म के प्रतीक होंगे। उनके जन्म से तीनों लोकों में उत्पात मचेगा। वे साधुओं, स्त्रियों और निरपराध प्राणियों को कष्ट देंगे। जब उनके पापों का घड़ा भर जाएगा, तब स्वयं भगवान उनका संहार करेंगे।”
इन वचनों को सुनकर दिति का हृदय काँप उठा। परंतु उसने संयम रखते हुए कहा—
“हे भगवन्! यदि उनका अंत निश्चित है, तो मैं यही चाहती हूँ कि उनका वध साक्षात् भगवान के हाथों हो। ब्राह्मण के शाप से नहीं, क्योंकि शाप से मारा गया प्राणी नरकगामी होता है।”
दिति के इन शब्दों में पश्चाताप भी था और भक्ति की एक झलक भी। कश्यप ने उसे सांत्वना देते हुए कहा—
“हे देवी! तुम्हारे हृदय में जो पश्चाताप है, वही तुम्हारा पुण्य बनेगा। तुम्हारे वंश में एक ऐसा पौत्र जन्म लेगा जो भगवान का परम भक्त होगा। वह साधुओं की सेवा करेगा, धर्म की रक्षा करेगा और तुम्हारे कुल का नाम उज्ज्वल करेगा। वह काल पर भी विजय प्राप्त करेगा और अंततः भगवान का पार्षद बनेगा।”
यह सुनकर दिति के अश्रु थम गए। उसके हृदय को एक विचित्र शांति मिली। उसने समझ लिया कि सृष्टि का विधान कठोर अवश्य है, परंतु न्यायपूर्ण है। उसके गर्भ में पल रहे बालक भले ही अधर्म के प्रतीक हों, पर उसी वंश से भक्ति का प्रकाश भी प्रकट होगा।
समय के प्रवाह के साथ दिति का गर्भ बढ़ता गया। परंतु जैसे-जैसे वह समय निकट आता गया, सृष्टि में असामान्य लक्षण प्रकट होने लगे। ऋषियों के यज्ञों में विघ्न आने लगे। देवताओं के मन में अनजाना भय घर करने लगा। आकाश में बार-बार अशुभ संकेत दिखने लगे। यह सब उस आने वाले दैत्य वंश की आहट थी।
अंततः वह दिन आया, जब दिति ने दो पुत्रों को जन्म दिया। उनका नाम महर्षि कश्यप ने रखा—हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष। जन्म लेते ही वे साधारण शिशुओं की भाँति नहीं रहे। उनका शरीर क्षण-क्षण में बढ़ने लगा। वे आकाश को स्पर्श करने लगे। उनकी आँखों में जन्मजात क्रूरता थी और मुख पर अहंकार की छाया।
उनके जन्म के साथ ही तीनों लोकों में भयंकर उत्पात मच गया। पृथ्वी काँप उठी। स्वर्ग में देवताओं के सिंहासन डोलने लगे। पाताल में दानव उल्लसित हो उठे। सूर्य और चंद्र पर राहु-केतु बार-बार छा गए। उल्कापात होने लगे। नदियाँ सूख गईं। गायों के स्तनों से रक्त बहने लगा। उल्लू और सियार रोने लगे, मानो मृत्यु का संदेश दे रहे हों।
देवताओं ने भयभीत होकर ब्रह्मा जी से कहा—
“हे पितामह! यह कैसा अनिष्ट है?”
ब्रह्मा जी ने गहरी दृष्टि से पृथ्वी की ओर देखते हुए कहा—
“यह दिति के गर्भ से जन्मे दैत्य हैं। ये वही जय और विजय हैं, जिन्हें सनकादि ऋषियों का शाप प्राप्त हुआ था। अब ये तीन जन्मों तक भगवान से वैर रखेंगे और अंततः उन्हीं के हाथों मुक्त होंगे।”
इस प्रकार दिति के अपराध से दैत्य वंश की उत्पत्ति हुई। यह वंश सृष्टि के लिए संकट बना, पर उसी संकट ने आगे चलकर भगवान के महान अवतारों को भी प्रकट किया। अधर्म के अंधकार के बीच ही धर्म के प्रकाश की भूमिका लिखी जा चुकी थी।
और कहीं न कहीं, उसी गर्भ में—
भविष्य का महासंग्राम आकार ले चुका था।
अध्याय 3 : जय–विजय का शाप और वैकुंठ से पतन
वैकुंठ लोक—जहाँ काल का प्रवेश नहीं, जहाँ दुःख, भय और अहंकार का अस्तित्व नहीं। वह दिव्य धाम जहाँ भगवान विष्णु अनंत शेष पर विराजमान रहते हैं और लक्ष्मी जी उनकी सेवा में सदा उपस्थित रहती हैं। उस धाम की शोभा ऐसी थी कि स्वयं वेद भी उसका पूर्ण वर्णन नहीं कर सकते। वहाँ का प्रत्येक कण शांति, भक्ति और आनंद से परिपूर्ण था। उसी वैकुंठ के द्वार पर दो महापराक्रमी द्वारपाल रहते थे—जय और विजय। वे भगवान के परम सेवक थे, उनके आदेश के पालन में अडिग, परंतु कालांतर में उनके हृदय में एक सूक्ष्म अहंकार ने स्थान बना लिया था।
एक समय चारों सनकादि ऋषि—सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार—समस्त लोकों से विरक्त होकर केवल भगवान नारायण के दर्शन की कामना से वैकुंठ की ओर चले। वे बाल स्वरूप में थे, किंतु ज्ञान में ब्रह्मा से भी अग्रगण्य। उनके मन में न क्रोध था, न लोभ, केवल ईश्वर-प्रेम की निर्मल धारा प्रवाहित हो रही थी। वैकुंठ के द्वार पर पहुँचते ही उन्होंने जय–विजय से कहा—
“हे द्वारपालो! हम भगवान विष्णु के दर्शन करने आए हैं। कृपया द्वार खोलो।”
जय और विजय ने उन्हें ऊपर से नीचे तक देखा। बालकों के रूप में ऋषियों को देखकर उनके मन में संदेह उत्पन्न हुआ। अहंकारवश उन्होंने कठोर स्वर में उत्तर दिया—
“तुम लोग कौन हो? इस समय भगवान विश्राम में हैं। बिना अनुमति कोई भीतर नहीं जा सकता।”
सनकादि ऋषि चकित रह गए। उन्होंने शांति से कहा—
“हम ब्रह्मा के मानस पुत्र हैं। हमारे लिए कोई द्वार बंद नहीं हो सकता। हम विष्णु के परम भक्त हैं।”
परंतु जय–विजय का अहंकार और अधिक प्रबल हो गया। उन्होंने कहा—
“भक्ति का दावा करने से कोई भीतर नहीं जा सकता। लौट जाओ।”
यह सुनकर सनकादि ऋषियों का तेज प्रकट हो उठा। उनके मुख से गंभीर वचन निकले—
“अरे मूढ़ो! भगवान के समीप रहकर भी तुम्हारे हृदय में अहंकार उत्पन्न हो गया है। वैकुंठ में अहंकार का कोई स्थान नहीं। तुम द्वारपाल होकर भी समदर्शी नहीं हो सके। यह अधर्म है।”
जय–विजय ने फिर भी द्वार न खोला। तब ऋषियों का धैर्य टूट गया। क्रोध से उनका स्वर गूँज उठा—
“तुम दोनों ब्राह्मणों का अपमान कर रहे हो। अतः हम तुम्हें शाप देते हैं—तुम दोनों वैकुंठ से गिरकर पापयोनि में जन्म लोगे।”
यह सुनते ही जय–विजय के मुख का तेज बुझ गया। उनके हाथ काँपने लगे। उन्हें अपने अपराध का बोध हुआ। वे तुरंत ऋषियों के चरणों में गिर पड़े और करुण स्वर में बोले—
“हे महर्षियों! हमसे अज्ञानवश अपराध हो गया। कृपया हमें क्षमा करें। हम भगवान के सेवक हैं, हम वैकुंठ से पृथक नहीं रह सकते।”
उसी क्षण वैकुंठ में हलचल हुई। भगवान विष्णु स्वयं लक्ष्मी जी और अपने समस्त पार्षदों के साथ वहाँ प्रकट हुए। उनका मुख करुणा से दीप्त था। उन्होंने सनकादि ऋषियों को प्रणाम करते हुए कहा—
“हे मुनिश्रेष्ठों! ये मेरे पार्षद हैं। इन्होंने अहंकारवश आपका अपमान किया है। ब्राह्मणों का अपमान मेरा ही अपमान है। आपने जो शाप दिया है, वह धर्म के अनुसार है।”
भगवान के वचनों से सनकादि ऋषियों का क्रोध शांत हो गया। उन्होंने विनम्रता से कहा—
“हे नाथ! हमने क्रोध में आकर इन्हें शाप दिया है। यदि आप चाहें तो हमारे शाप को निष्फल कर सकते हैं।”
भगवान विष्णु ने गंभीर स्वर में उत्तर दिया—
“हे मुनिगण! मैं सर्वशक्तिमान होते हुए भी ब्राह्मणों के वचन को असत्य नहीं करना चाहता। यह शाप मेरी ही प्रेरणा से हुआ है। किंतु मैं इन्हें एक विकल्प देता हूँ।”
जय–विजय ने आशा भरी दृष्टि से भगवान की ओर देखा। भगवान ने कहा—
“तुम दोनों तीन जन्मों तक मेरे शत्रु बनोगे और असुर योनि में जन्म लोगे। प्रत्येक जन्म में मैं स्वयं तुम्हारा संहार करूँगा। मेरे हाथों मृत्यु प्राप्त कर तुम पुनः वैकुंठ लौट आओगे। अथवा सात जन्मों तक भक्त बनकर जन्म लो। बोलो, क्या स्वीकार है?”
जय–विजय ने एक-दूसरे की ओर देखा। फिर एक स्वर में बोले—
“हे प्रभु! हम आपके शत्रु बनना स्वीकार करते हैं, परंतु आपसे दूर रहना हमें स्वीकार नहीं।”
भगवान के नेत्रों में करुणा भर आई। उन्होंने कहा—
“तथास्तु। तुम तीन जन्मों के पश्चात् पुनः मेरे धाम में लौट आओगे।”
और उसी क्षण—
वैकुंठ के द्वार काँप उठे।
जय–विजय दिव्य तेज से रहित होकर नीचे गिरने लगे।
वे वैकुंठ से पतित होकर पृथ्वी की ओर बढ़ चले।
देवताओं ने देखा—
भविष्य की भयंकर कथा अब आरंभ हो चुकी थी।
उनका प्रथम जन्म सतयुग में हुआ—
हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष के रूप में।
और इसी पतन के साथ
दैत्य वंश का वास्तविक आरंभ हुआ।
अध्याय 4 : हिरण्याक्ष का जन्म और तीनों लोकों में उत्पात
जिस क्षण दिति के गर्भ से वह बालक उत्पन्न हुआ, उसी क्षण सृष्टि की गति थम-सी गई। वह साधारण जन्म नहीं था, वह एक ऐसे प्राणी का अवतरण था जिसकी उपस्थिति मात्र से तीनों लोकों की नींव हिल उठी। जैसे ही हिरण्याक्ष ने प्रथम श्वास ली, आकाश में घनघोर गर्जना होने लगी। दिशाएँ काँप उठीं और पृथ्वी माता ने कराह कर कहा—
“यह भार… यह भार मैं सहन नहीं कर पा रही।”
उस बालक के जन्म के साथ ही भयानक उत्पात प्रारंभ हो गया। स्वर्गलोक में देवताओं के सिंहासन डोल उठे। पाताललोक में दानव उल्लास से गर्जना करने लगे। मृत्युलोक में मनुष्य भयभीत होकर आकाश की ओर देखने लगे। सूर्य का तेज मलिन पड़ गया और चंद्रमा पर राहु-केतु बार-बार छा गए। नदियों का जल सूखने लगा, जलाशय रिक्त होने लगे और धरती की नसों में जैसे प्राण-शक्ति क्षीण हो गई।
हिरण्याक्ष का शरीर जन्म लेते ही साधारण शिशु के समान नहीं रहा। क्षण-क्षण में वह बढ़ने लगा। उसका कलेवर पर्वत के समान विशाल होता चला गया। उसकी भुजाएँ लोहे के स्तंभों की भाँति दृढ़ थीं और उसकी आँखों में अग्नि की ज्वाला दहक रही थी। स्वर्णिम कवच जैसे उसके शरीर का अंग हों, ऐसे प्रतीत होते थे। जन्म लेते ही उसके मुख से एक गर्जना निकली, जिसने स्वर्ग तक को कंपा दिया।
महर्षि कश्यप ने उस बालक को देखकर गंभीर स्वर में कहा—
“हे दिति! यही है वह पुत्र, जिसके विषय में मैंने तुम्हें चेताया था। इसका नाम होगा—हिरण्याक्ष।”
दिति ने काँपते स्वर में उत्तर दिया—
“हे स्वामी! क्या यह बालक ही सृष्टि के लिए संकट बनेगा?”
कश्यप ने गहरी दृष्टि से उसे देखते हुए कहा—
“यह केवल संकट नहीं, यह स्वयं संकट का स्वरूप है।”
हिरण्याक्ष के साथ उसका भ्राता हिरण्यकशिपु भी उत्पन्न हुआ। दोनों यमल बालक थे, किंतु स्वभाव में अग्नि और बारूद की भाँति। हिरण्यकशिपु का हृदय सत्ता और अमरत्व की लालसा से भरा था, जबकि हिरण्याक्ष का चित्त केवल युद्ध और विनाश के लिए व्याकुल था। बचपन से ही उसके हाथ में खिलौनों के स्थान पर शस्त्र शोभा देने लगे। उसका हँसना भी गर्जना जैसा प्रतीत होता था।
जैसे-जैसे हिरण्याक्ष बड़ा होने लगा, वैसे-वैसे तीनों लोकों में भय की छाया गहराती गई। वह बिना किसी कारण पर्वतों को उखाड़ फेंकता, समुद्र के जल को उथल-पुथल कर देता और दैत्यों को युद्ध के लिए उकसाता। वह गर्जना करके कहता—
“इस सृष्टि में ऐसा कौन है जो मेरे बल के सामने टिक सके? देव? ऋषि? या स्वयं विष्णु?”
उसकी यह गर्जना देवताओं के कानों तक पहुँची। स्वर्ग में इंद्र ने चिंतित होकर देवगुरु बृहस्पति से कहा—
“गुरुदेव! यह कौन सा दैत्य है जिसकी शक्ति से दिशाएँ काँप रही हैं?”
बृहस्पति ने गहरी साँस लेते हुए कहा—
“देवराज! यह जय–विजय का पतित रूप है। इसका अंत केवल नारायण के हाथों ही संभव है।”
पाताललोक में दानवों ने हिरण्याक्ष को अपना नायक मान लिया। वे उसकी स्तुति करते और कहते—
“हे महाबली! तुम ही हमारे रक्षक हो। देवताओं को उनका अहंकार दिखा दो।”
हिरण्याक्ष उनकी बात सुनकर अट्टहास करता और उत्तर देता—
“मैं ऐसा युद्ध करूँगा कि देवता अपने स्वर्ग को भूल जाएँगे।”
मृत्युलोक में ऋषि-मुनि भयभीत थे। यज्ञों में बार-बार विघ्न आने लगे। अग्नि प्रज्वलित नहीं होती थी। मंत्रों की शक्ति क्षीण होने लगी थी। एक दिन नारद मुनि ने चिंतित होकर कहा—
“यह दैत्य केवल शरीर से नहीं, अपने अहंकार से भी विशाल है। इसका पाप शीघ्र ही सीमा पार करेगा।”
हिरण्याक्ष की दृष्टि अब केवल युद्ध पर टिक चुकी थी। वह किसी योग्य प्रतिद्वंद्वी की खोज में भटकने लगा। देवताओं से युद्ध उसे पर्याप्त नहीं लगता था। वह गर्जना करके कहता—
“मुझे ऐसा योद्धा चाहिए जो मेरे सामने टिक सके। अन्यथा यह सृष्टि मेरे लिए खेल मात्र है।”
तीनों लोकों में यह स्पष्ट हो गया था कि यह उत्पात केवल आरंभ है। पृथ्वी माता ने पुनः करुण स्वर में पुकार की—
“हे नारायण! यह दैत्य मेरे वक्ष को विदीर्ण कर रहा है। मेरा भार असह्य होता जा रहा है।”
वैकुंठ में भगवान विष्णु ने यह पुकार सुनी। उन्होंने गंभीर स्वर में कहा—
“जब अहंकार पृथ्वी का भार बन जाए, तब उसका नाश अनिवार्य है।”
और उसी क्षण,
सृष्टि के गर्भ में
वराह अवतार की भूमिका लिखी जाने लगी।
यह उत्पात, यह गर्जना, यह भय—
सब किसी एक महासंग्राम की
पूर्वसूचना मात्र था।