सरेंडर करनेवाले एक भी नक्सली को सजा नहीं दिला सकी है पुलिस
सरेंडर करनेवाले एक भी नक्सली को सजा नहीं दिला सकी है पुलिस
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रांची। हार्डकोर नक्सली कुंदन पाहन के पुलिस के समक्ष सरेंडर करने के तरीकेे को लेकर उठा विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। सरकार में शामिल आजसू पार्टी के बाद भाजपा सांसद डॉ रवींद्र राय ने कुंदन को हीरो की तरह पेश करने को दुर्भाग्यपूर्ण बताया है। कुंदन का जिस तरह आत्मसमर्पण कराया गया और उसे पंद्रह लाख रुपये का चेक दिया गया, उससे विपक्षी दलों और आमलोगों में भी नाराजगी है। इसे लेकर सरेंडर पॉलिसी पर ही सवाल उठ रहे हैं और उसे खत्म करने की मांग हो रही है। विभिन्न संगठनों की ओर से कुंदन को कड़ी सजा देने की मांग की जा रही है।
इस बीच सांसद डॉ राय ने डीजीपी को इस मामले में पत्र लिखा है। इसमें कहा गया है कि आत्मसमर्पण कर शांति का रास्ता अपनाना सराहनीय है। लेकिन अपने कुकर्मों का दंड भोगने के लिए तैयार रहना ही सच्चा आत्मसमर्पण होगा। पत्र में डॉ राय ने लिखा है कि कुंदन जैसे हत्यारों को सम्मान देने की जरूरत नहीं है। उसे जीने का अधिकार मिल जाये, यही काफी होगा। आजसू ने झारखंड पुलिस पर कुंदन को महिमामंडित करने का आरोप लगाते हुए कहा है कि जिस तरह प्रोत्साहन राशि के रूप में उसे 15 लाख रुपये का चेक दिया गया, उससे राज्य के युवा नक्सली बनने के लिए प्रेरित होंगे। सरकार युवाओं को नौकरी नहीं दे रही है और जो अपराध करके आ रहे हैं उन्हें महिमामंडित किया जा रहा है।
आजसू के मुख्य प्रवक्ता डॉ देवशरण भगत ने कहा है कि सरकार को नक्सलियों की सरेंडर नीति पर पुनर्विचार करना चाहिए। दरअसल झारखंड में सक्रिय नक्सलियों और उग्रवादियों के लिए वर्ष 2008 में सरेंडर पॉलिसी बनी थी। तब से अब तक करीब 150 नक्सलियों और उग्रवादियों ने पुलिस के समक्ष सरेंडर किया है। लेकिन पुलिस इनमें से किसी को भी आज तक सजा नहीं दिला पायी है। जबकि सरेंडर पॉलिसी में इसका उल्लेख है कि आत्मसमर्पण करनेवाले नक्सलियों और उग्रवादियों के खिलाफ दर्ज जघन्य मामलों को विधि सम्मत निष्पादित किया जायेगा। सरेंडर पॉलिसी में नक्सलियों के खिलाफ लंबित मुकदमों को निपटाने के लिए विशेष न्यायालय (फास्ट ट्रैक कोर्ट) गठित करने का भी प्रावधान है।
लेकिन आज तक किसी भी नक्सली के खिलाफ लंबित मुकदमों को निबटाने के लिए एक भी फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन नहीं कराया गया है। सरेंडर पॉलिसी में कहा गया है कि हर वर्ष इसकी समीक्षा की जायेगी और इसमें जरूरत के अनुसार आवश्यक संशोधन किया जायेगा। बीते नौ साल में सिर्फ एक बार 2015 में इसकी समीक्षा की गयी थी जिसमें नक्सलियों पर सिर्फ ईनाम की राशि बढ़ाने का निर्णय लिया गया था। सरकार ने जिन नक्सलियों पर ईनाम की घोषणा कर रखी है उनपर आगे भी ईनाम घोषित रखने की जरूरत है या नहीं ,इसकी कभी समीक्षा नहीं की गयी। यही वजह है कि पांच साल पहले भाकपा माओवादी संगठन से नाता तोड़ने के बावजूद कुंदन पंद्रह लाख का ईनामी बना हुआ था।













