इंतज़ार करना होगा
झूठ तुरंत जीत जाता है और सच छिप जाता है जब समय बित जाता है तो सच बाहर आता है
अगर आप सही हो तो कुछ गलत नहीं होगा लेकिन इंतज़ार करना होगा उस दिन का जब सब सही होगा
~ राहुल सिंह
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इंतज़ार करना होगा
झूठ तुरंत जीत जाता है और सच छिप जाता है जब समय बित जाता है तो सच बाहर आता है
अगर आप सही हो तो कुछ गलत नहीं होगा लेकिन इंतज़ार करना होगा उस दिन का जब सब सही होगा
~ राहुल सिंह
अचानक
कई लोग रोज़ टकराते हैं आँखों के सामने से निकल जाते हैं पर कोई एक ही होता है जिस पर नज़र ठहर जाती है
न यह भूत में होती है न यह भविष्य में होती है यह अभी इसी क्षण में होती है मोहब्बत अचानक ही होती है
~ राहुल सिंह
हार नहीं मान पाता हूँ
कुछ भी करता हूँ कार्य नहीं बनता है बार बार प्रयत्न करता हूँ क्योंकि खाली नहीं बैठ पाता हूँ ना
हमेशा सच का साथ देता हूँ फिर भी हार जाता हूँ क्या करूँ मैं भी अपनी नज़रों में गिर नहीं पाता हूँ ना
मेरी वफ़ा का कोई ईनाम नहीं मिला मुझको अलबत्ता मुझे गद्दार कहा गया फिर भी मेरी वफ़ा डगमगाई नही क्योंकि धोखा नहीं दे पाता हूँ ना
आसान नही है कुछ भी मेरे लिए इसलिए हर बार करता हूँ वक़्त का सामना मेरी जिंदगी बहुत कठिन है क्योंकि हार नहीं मान पाता हूँ ना
~ राहुल सिंह
पत्थर भी सितारे बन जाते हैं
अगर तू ग़ुलाम है तो इसमे तेरी मर्ज़ी शामिल है अगर तू लाचार है तो इसमे तेरी मर्ज़ी शामिल है अगर तू बेबस है तो इसमे तेरी मर्ज़ी शामिल है अगर तू कमज़ोर है तो इसमे तेरी मर्ज़ी शामिल है
किसी ने रोका नहीं है तुझे इन पहाड़ों की चोटीयों पर जाने से किसी ने रोका नहीं है तुझे यह कहने को की, मैं जीवित हूँ किसी ने रोका नहीं है तुझे इन पर्वतों की ऊंचाइयां से ये कहने को कि, मैं आज़ाद हूँ, मैं आज़ाद हूँ, मैं आज़ाद हूँ
गूंजती है यहाँ आवाज़ जरा दहाड़ कर तो देख पत्थर भी सितारे बन जाते हैं ज़रा पत्थर को आसमां में उछाल कर तो देख
~ राहुल सिंह
हार कर जाने वालों में मैं नही
कई लोग मुझे धक्का दे रहे थे यह लोग मुझे गिराना चाहते थे बड़ी पीड़ा झेल रहा था मैं मेरे एक-एक रोम छिद्र सभी दिशाओं में लड़ाई लड़ रहे थे
जीवन में ऐसा समय कभी कभी आता है जब सब साथ छोड़ जाते हैं और लड़ना पड़ता है अकेला पर सवाल उठता है किसने मुझे इस धरती पर है धकेला
कुछ और समझ आये या न आये समझ आता है गलत और सही अब आ गया हूँ तो लडूगा तो ज़रूर क्योंकि हार कर जाने वालों में मैं नही
~ राहुल सिंह
मानव का मुकद्दर
जब पानी बर्फ बन जम सकता है और लोहा पिघल सकता है जब धूल से अंतरिक्ष में सितारा बन सकता है जब जमीं में दबा पत्थर भी हीरा बन सकता है तो फिर मानव का मुकद्दर कैसे नहीं बदल सकता है
~ राहुल सिंह
इत्तेफाक
कल मैं ख़ुद अपनी मर्जी से उससे मिलने गया था उसे लगा मैं यूँ ही मिलने चला आया आज जब सड़क पर पड़े फूलों को मैंने उठा लिया तभी इत्तेफाक से बाज़ार में वह मिल गई, उसे लगा मैं ये फ़ूल उसके लिए लाया
~ राहुल सिंह
पुराने हिसाब
महकने की बात चली तो उन गुलाबों की याद आई दर्द की बात चली तो उन काँटों की याद आई मुझे न ग़ुलाब चाहिए न काटें पर उपर वाले ने पुराने हिसाब के पर्चे हमेशा हैं बाटें
कर्म की गति कभी नहीं रूकती बंद कमरों में बैठने पर भी सांसे है चलती सांस लेने और छोड़ने में ही कर्म का बंधन लग जाता है लगता है इसकी कोई और तरकीब है जो बंधन छुड़ाता है
जो खुद को बड़ा माने वह बंधता जाता है जो स्वयं को कुछ न समझे वह छूटता जाता है और जब श्रीहरि का साथ मिल जाए तो फिर वह तर जाता है
~ राहुल सिंह