चैतन्य भारत न्यूज
हिंदू धर्म में शीतला माता की पूजा का विशेष महत्व है। शीतला माता रोगों को दूर करने वाली माता मानी जाती हैं। शीतला षष्ठी व्रत माघ शुक्ल पक्ष की षष्ठी को किया जाता है। इस बार शीतला षष्ठी 31 जनवरी को पड़ रही है। आइए जानते हैं शीतला षष्ठी का महत्व और पूजा-विधि।
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शीतला षष्ठी का महत्व
शीतला षष्ठी व्रत मुख्य रूप से महिलाएं करती हैं। मान्यता है कि इस व्रत को करने से दैहिक और दैविक ताप से मुक्ति मिलती है। कहा जाता है कि जब बच्चों को शरीर पर माता निकल आती थी यानी छोटे छोटे दाने पूरे शरीर पर निकल आते थे तो बुजुर्ग इसे मां शीतला का प्रकोप मानते थे। इसीलिए मां शीतला को शांत करने के लिए और प्रसन्न करने के लिए इस व्रत का आरंभ हुआ। कई बार इस बीमारी को चेचक का रूप भी माना जाता था। कहा जाता है कि इस व्रत को रखने से महिलाओं को पुत्र की प्राप्ति होती है और वह स्वस्थ रहता है।
शीतला षष्ठी पूजा-विधि
शीतला षष्ठी को सुबह जल्दी उठकर नहाएं और स्वच्छ कपड़े धारण करें।
इसके बाद पूजा की थाली में दही, रोटी, बाजरा, मीठे चावल, नमक पारे और मठरी रखें।
इसके अलावा दूसरी थाली में आटे से बना दीपक, रोली, वस्त्र, अक्षत, हल्दी, मोली, सिक्के और मेहंदी रखें। साथ ही दोनों थाली के साथ में एक लोटे में ठंडा पानी रखें।
शीतला माता की पूजा करें और दीपक को बिना जलाए ही मंदिर में रखें।
पूजा के दौरान मेहंदी और कलावा सहित सभी सामग्री माता को अर्पित करें।
अंत में जल चढ़ाएं और थोड़ा जल बचाएं। इसे घर के सभी सदस्य आंखों पर लगाएं और थोड़ा जल घर के हर हिस्से में छिड़कें।
अगर पूजन सामग्री बच जाए तो इसे ब्राह्मण को दान कर दें।
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