जिंदगी...
असान नहीं ये जिंदगी कश-म-कश भारी है।
तूफानों के समन्दर मे इक कश्ती सी फंसी है।
कुछ मैं भी हूँ अतरंगा नए रिवाजों में चूर हूं
लापता हैं मंज़िले बस अपनी मस्ती में मलंग हूं।
पर जा हर ठोर ठिकाने पे इक बात को है सिखा
"कितना भी दूर उड़ ले परींदे आखिर में ठिकाना पेड की शाखो पे ही है मिलना।"











