मैं हॉस्टल से घर, यही करने जाती थी—
माँ के बालों की महक, रसोई की सुगंध, दादा के आफ्टरशेव में फिटकरी
दादी की गोद और पापा की पियर्स वाली साबुन, बाग में पुष्पसार और बरामदे पे आने वाली सामने की गौशाला से गोबर की गंध
—ये खुशबुएं, जो गैरियत में मुझे ज़िंदा रखती हैं, इन्हें भूल जाने का डर मुझे हमेशा लगा रहता है।





















