कहते हैं, अपनी जान लेने के लिए *हिम्मत* की जरूरत होती है ।
लेकिन, शायद हिम्मत से भी ज़्यादा इस बात का एहसास होता है :
"ज़िन्दगी में आगे अंधेरे के सिवा कुछ नजर नहीं आता।
ना खुशियां नज़र आती है, ना सुकून महसूस होता है।
उस पार क्या है, किसी को पता तो नहीं, लेकिन इस पार भी अब कुछ बचा नहीं।
उम्मीद भी कुछ इस क़दर मायूस होती है , के कोई उम्मीद भी नहीं रहती।
अपने साए भी मन कचोटने लगे हैं अब तो, क्यों सांसे ले रहा है बेगैरक।
किस के लिए जिएं, के जिनके लिए जीते थे वे भी अपने ना रहे।
साथ में जो चला, सबका अपना स्वार्थ था ।
कोई नहीं होता किसी का , और ना कभी हो पाएगा ।
तू अकेला ही आया था , अकेला ही जाएगा ।
औरों की खुशी को संवारते संवारते , कब अपनी खुशियों का गला घोंटा ।
अपनो ने मेरी ही ज़िन्दगी को किश्तों में बांटा ।
और भी हैं गम , सब से, क्या कोई शिक्वा करें।
अपनो ने दिल तोड़ा, किससे क्या क्या बयां करें।