Avni ve Nahaven Sandhana yı zehirlemeyi planlıyor. #delidivane #bidaai #sandha #alekh #alek
seen from United States
seen from United States

seen from United States
seen from Germany
seen from Russia

seen from China
seen from Jordan

seen from Brazil

seen from Kazakhstan
seen from United States
seen from Estonia

seen from Philippines
seen from Germany
seen from China
seen from United States
seen from China

seen from Philippines
seen from United Kingdom
seen from China

seen from Canada
Avni ve Nahaven Sandhana yı zehirlemeyi planlıyor. #delidivane #bidaai #sandha #alekh #alek
हिंदी को जरूरत है एक “क्यों” की : संपादकीय आलेख (हनीफ मदार) हिंदी को जरूरत है एक “क्यों” की फिर से हिंदी दिवस पर मैं असमंजस में हूँ हर साल की तरह, ठीक वैसे ही जैसे हर वर्ष मदर्स डे, फादर्स डे.......लम्बी सी लिस्ट है (कुछ और का आविष्कार और हो गया होगा, उसकी जानकारी मुझे नहीं है) इस पर भी इसी तरह असमंजस में रहता हूँ | क्योंकि हिंदी के पैरोकारी, रक्षक, संस्कारी शिक्षकों से तो हमने जो सीखा उसके अनुसार तो मां हमेशा ही मां है, रही है और रहेगी | फिर चाहे मां जीवित न भी हो तब भी हम उसके आंचल के नर्म कोमल एहसास से कभी दूर नहीं होते | मां हमारे लिए जो करती है उसे हम कई जन्म लेकर भी नहीं चुका सकते |” ऐसे ही तो पढ़ाया जाता रहा ....? इस हिसाब से मदर या फादर डे तो रोजाना ही है | फिर यह ख़ास ‘डे’ की जरूरत आखिर क्यों ? क्या यह माँ-बाप के प्रति हमारे मन में सम्मान आदर और प्रेम बढाने के प्रचार प्रसार का नतीज़ा है ....? तब क्या इससे पहले माँ बाप के प्रति आदर सम्मान या प्रेम नहीं था, जब यह ख़ास ‘डे’ नहीं थे.....? यह मैंने कुछ नई या अनूठी बात नहीं कह दी है, सब जानते हैं इस बात....को ! सच मानिए, मैं भी जानता हूँ कि आप इतनी छोटी सी बात से भला अनभिज्ञ कैसे रह सकते हैं ! किन्तु आपके संज्ञान में है यह सब, तभी तो मेरे भीतर कुछ कुलबुलाता है और एक ‘क्यों’ पैदा करता है | क्योंकि यकीनन यही हमारी भाषा के साथ भी हो रहा है | क्या तब भी ‘’क्यों’’ पैदा न किया जाय....? कोई बहुत बड़ा तीरंदाज़ है जो एक-एक तीर से कई-कई निशाने साध रहा है | भारतीय समाज की हर एक भावना में वह अपना हित-लाभ खोजकर तीर चलाता है | उसी में कहीं शामिल है हमारी भाषा के लिए हिंदी दिवस | जो महज़ मनाया जाता है, अपनी मातृभाषा के प्रति अकूत प्रेम दर्शाने को | अपनी मातृभाषा को मां की संज्ञा के साथ उसके लिए मर-मिटने का अभिनय करके हमें दिखाने के लिए | अपने गले में पडे रत्नजड़ित हारों और आभूषणों में से कुछ को उतारकर खैरात के रूप में उन पैरोकारों में लुटा देता है जो कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में उसके चलाये तीर का मार्ग अवरुद्ध नहीं करते हैं | और छुट्टी पा ली जाती है अगले एक वर्ष के लिए अपनी मातृभाषा से | मेरे इन वाक्यों को पढ़ते हुए हिंदी के कथित पैरोकार जरूर तिलमिलायेंगे, मुझे कम अक्ल आंक कर गरियाएंगे, यदि हिंदी विरोधी भी कह दें तो अतिश्योक्ति नहीं है | वे यह सब तो जरूर करेंगे लेकिन हिंदी के हित में अपने भीतर एक ‘क्यों’ पैदा नहीं करेंगे | क्योंकि वे “हुइए वही जो राम रचि राखा, को करि सकत बढावहिं शाखा | को माने बैठे हैं | और फिर मलाईदार चासनी पानी है तो सत्ता की ही बजानी है | हिंदी के प्रचार प्रसार के लिए हर वर्ष की तरह इस साल भी कई घोषणाएं हुईं हैं | इसके बावजूद भी....... क्यों......? हिंदी विश्व की दूसरे न० की मातृभाषा होने का दावा करने के बाद भी अपने ही घर में इतनी कमज़ोर और दोयम दर्जे की प्रतीत होती है जो जीवन यापन के लिए 70 साल का लोकतंत्र हो जाने के बाद भी किसी रोजगार की गारंटी नहीं देती...? जबकि न केबल नौ-दस राज्यों बल्कि केन्द्रशासित क्षेत्रों में हिंदी बोलने वालों की संख्या भी करीब 90 फीसदी तक है | अभी पिछले दिनों जब पश्छिमी बंगाल गया | वहाँ न केवल कलकत्ता जैसे बड़े शहरों बल्कि एकदम से गांवों में भी घूमा | वहाँ मैंने जान-बूझकर हिंदी के अलावा किसी अन्य भाषा का इस्तेमाल नहीं किया और बंगाली मुझे आती नहीं थी | बावजूद इसके मुझे कहीं भी क्षणभर के लिए भी अंश मात्र भी दिक्कत नहीं आई | वहाँ दूसरे न० की आवश्यक भाषा हिंदी ही बताई गई | हिंदी को लेकर कमोवेश यही स्थिति पूरे भारत की है यदि दक्षिण भारत के एक आध राज्य को छोड़ दें तो.... लेकिन वहाँ भी हिंदी फिल्में खूब कमाई करतीं हैं | बल्कि प्रत्यक्ष तौर पर महाराष्ट्र, गुजरात और आंध्रप्रदेश से सरकार में मंत्री पद हासिल करने वाले ज्यादातर मंत्रियों को हिंदी में ही शपथ लेते भी देखा गया फिर क्यों इन सत्तर सालों के बाद भी हिंदी को राष्ट्रीय भाषा का दर्जा नहीं दिया जा सका...? इतना ही नहीं बल्कि साल दर साल हिंदी दिवस मनाने और ढेरों खैरात बांटने के बाद भी, भारत में स्थापित असंख्य सेवा प्रदाता कम्पनियों में अपनी शिकायत के लिए एक आम भारतीय नागरिक हिंदी में चिट्ठी या मेल नहीं लिख सकता | हिंदी में बात करने पर क्यों उसे पिछड़ा हुआ कमतर या अशिष्ट तक मान लिया जाता है | क्यों एक बेहतर व्यावसायिक रणनीति (प्रेजेंटेशन) बनाने और बताने वाला व्यक्ति इसलिए बाहर खड़ा रह जाता है कि वह हिंदी में बताता है....? सरकारी या गैर सरकारी विभागों में “हिंदी हमारी मातृभाषा है, हिंदी में काम करके गौरवान्वित हों” जैसे वाक्य लिखीं पट्टियां लगवाने और हिंदी के लिए ऐसे स्लोगन गढ़ने के लिए हर वर्ष करोड़ों करोड़ खर्च करने बाद भी हर जगह हर विभाग में हिंदी में काम करने वाला खुद को अपमानित होता क्यों पाता है....? यहाँ प्रसंगवश खुद के साथ गुजरा एक वाकया भी बताना जरूरी लग रहा है – दरअसल मैं एक राष्ट्रीयकृत बैंक में एक राष्ट्रीय शिक्षा संस्थान के लिए एक मांगपत्र (ड्राफ्ट) बनवाने गया | मैंने वहाँ से प्राप्त फॉर्म को हिंदी में भर कर दे दिया | तो मुझे कहा गया “इसे इंग्लिश में भर कर दीजिये |” मैंने बड़ी विनम्रता से कहा कि मुझे इंग्लिश नहीं आती |’ कुछ सहयोगी प्रवृति के राष्ट्रभक्तों ने मेरा फ़ार्म खुद भरने का प्रस्ताव तो दिया लेकिन अपनी मातृभाषा के हुए इस अपमान को समझ पाने की समझ शायद उनमें नहीं थी | मैं जब उस कर्मचारी के इस व्यवहार की शिकायत को लेकर बैंक प्रबन्धक के पास पहुंचा | तो उन्होंने बेहद सहज तरीके से बेशर्मी के साथ कहा हाँ इसे अंग्रेजी में ही भरना पड़ेगा | मैंने कहा फिर ये तख्तिया लगीं है, नारे लिखे हैं, हिंदी में काम करने को प्रेरित करने को.. फिर क्यों.....? इस ‘क्यों’ पर तो ज़नाब सिरे से ही उखड गए और बोले “जब तुम्हें इंग्लिश नहीं आती तो ड्राफ्ट की क्या जरूरत है ?” मैंने कहा श्रीमानजी इंग्लिश का आना न आना अलग बात है और ड्राफ्ट की जरूरत का होना न होना अलग है | और रही बात मेरे क्या होने की तो मैं एक भारतीय हूँ और अपनी भाषा का उपयोग कर रहा हूँ | महज़ हिंदी प्रेम का दिखावा नहीं मैं भी पूरी बेहयाई के साथ अपनी बात पर अड़ा रहा.... और अंततः मेरा ड्राफ्ट नहीं ही बना हिंदी में भरे फ़ार्म से | इस प्रसंग को यहाँ बताना मेरा खुद को हिंदी भक्त या हिंदी प्रेमी सिद्ध करना नहीं है क्योंकि मुझे अपनी भाषा के प्रति प्रेम, आदर या सम्मान सिद्ध करने को किसी के प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं है | आशय महज़ यह बताना भर है कि इस सत्तर वर्षीय लोकतंत्र पर काबिज़ होते बदलते चेहरों ने हिंदी को हासिये पर लाने में कोई कसर नहीं छोड़ी | उसे महज़ एक कार्यक्रम या ‘हिंदी डे’ तक ही लाकर सीमित कर दिया | यदि ऐसा न होता तो हिंदी बोलने, पढने और लिखने वाले न बेरोजगारी के असुरक्षाबोध से ग्रसित हो हिंदी को दूसरे दर्जे की भाषा मानने को मजबूर नहीं हो रहे होते | और तब दिखाई भी देता कि राजभाषा अधिनियम के अनुसार हमारे कर्णधारों ने कितना काम किया | हिंदी के प्रति हम सब के मन में अकाट्य आदर, प्रेम और सम्मान है किन्तु हिंदी दिवस उपहास का प्रतीक हो चला है | ठीक वैसे ही कि ‘मदर्स डे’ पर हम माँ की गोद में बैठ कर यह जताएं-बताएं कि देखो यह मेरी मां है.....मैं इसे बहुत प्यार करता हूँ | और बस एक दिन बाद ही, एक साल तक के लिए न माँ कि जरूरत और न परवाह ही | हालांकि हम भारतीयों की भावनाएं बहुत जल्दी आहात होतीं हैं किन्तु कमजोरों के खिलाफ और अतार्किकता के साथ | इन राष्ट्रीय भावनाओं से ओत प्रोत युवाओं की नाज़ुक भावनाओं को अपनी मातृभाषा के लिए भी कभी सत्ताओं के समक्ष एक “क्यों” भी पैदा करना चाहिए | कि आखिर क्यों लगभग पूरे भारत के लगभग हर क्षेत्र में हिंदी भाषी ही ‘श्रमिक’ के रूप में नज़र आते हैं, उच्च पदस्थ नहीं...? क्या कारण है कि भारत में बड़ी से बड़ी कम्पनी का अध्यक्ष या संचालन करने की बेहतर क्षमता रखने वाला व्यक्ति भी एक श्रमिक के रूप में ही देश भर में सप्लाई होता है, सिर्फ इसलिए कि वह हिंदी में लिखता-बोलता है.....? हिंदी दिवस पर खैरात बांटने की अपेक्षा क्यों यह प्रयास नहीं किया जाता कि कम से कम किसी भी सरकारी विभाग में सरकार द्वारा कोई भी नियम, आदेश और कार्यों का क्रियान्वयन हिंदी में ही होगा फिर चाहे वह आयकर विभाग हो दूरसंचार, रेलवे, विद्युत् या कोई अन्य | वैसे तो भारत में काम करने वाली सभी विदेशी कम्पनियों पर भी यह नियम लागू किया जाना ही चाहिए | दूसरी भाषाओं की तरह ही हिंदी के लेखकों या पत्रकारों के वेतन या पारिश्रमिक में बराबरी लाना खुद व् खुद हिंदी के प्रचार प्रसार की दिशा में एक बड़ा कदम हो जाएगा | सर्व विदित है कि चीन और यूरोपीय देशों में अपनी भाषा में ही काम करने कि बाद्ध्यता उन्हें विकास की दिशा में सबसे आगे दिखाती है क्योंकि उन देशों के हर अंतिम व्यक्ति की वैचारिक, मानसिक और श्रमिकीय उर्जा अपने देश के विकास में सहभागिता कर पाती है | ज़ाहिर है हम अपने देश में अपनी भाषा में ही काम करने को कानूनी अधिकार और माध्यम बनाएं तब निश्चित ही हर अंतिम भारतीय की बहुमुखी प्रतिभा और उर्जा देश के काम आ सकेगी |
समय के झरोखे से हरिशंकर परसाई… : आलेख (सुधेंदु पटेल)
समय के झरोखे से हरिशंकर परसाई… : आलेख (सुधेंदु पटेल)
(“हरिशंकर परसाई: – चर्चा ज़ारी है ….. ” का दसवाँ दिन ……..’सुधेंदु पटेल’ का आलेख )
हरिशंकर परसाई केवल लेखक कभी नहीं रहे. वे लेखक के साथ-साथ एक्टिविस्ट भी थे. उनका समूचा जीवन आन्दोलनों और यूनियनों से जुड़ा रहा. आन्दोलन छात्रों के, श्रमिकों के, शिक्षकों के, लेखकों के भी. वे लेखक के रूप में अपनी भूमिका के संबंध में असंदिग्ध थे. लेखक साम्प्रदायिकता का विरोध करना चाहिये, विश्वशांति का समर्थन करना…
View On WordPress
मुस्कुराहट बिखेरने से मिलती है वास्तविक खुशी: आलेख (सुशील कुमार भारद्वाज)
मुस्कुराहट बिखेरने से मिलती है वास्तविक खुशी: आलेख (सुशील कुमार भारद्वाज)
एक इंसान की खुशी दूसरे की भी खुशी हो, कोई जरूरी तो नहीं. जैसे इस दुनियां में सुंदरता और संतुष्टि का कोई निश्चित पैमाना नहीं है ठीक उसी प्रकार खुशी का कोई निश्चित स्वरूप या पारामीटर नहीं है. खुशी हमें हर उस क्षण से मिल सकती है जिस पल हम स्वयं को आनंदित करते है. परिवार, दोस्त, सहकर्मी या फिर जीवन में मिलने वाले हर प्राणी से निष्पक्ष एवं निष्कलुष भाव से मिलते हैं. जहां हम कुछ वापस पाने की आस लगाने…
View On WordPress
प्रेम एवम् विद्रोह के बीच खड़े मनोहर श्याम जोशी : आलेख (आशीष जायसवाल)
प्रेम एवम् विद्रोह के बीच खड़े मनोहर श्याम जोशी : आलेख (आशीष जायसवाल)
सभ्यता के विकास के साथ ही प्रेम और युद्ध से सम्बन्धित किस्से कहानियां प्रचलित होने लगी थीं ! प्रेम और युद्ध मानव मन को आकर्षित करतें हैं यही कारण है की प्रेम और युद्ध से सम्बन्धित किस्से कहानियां आज भी लिखे जा रहें है और संभवतः सभ्यता के अंत तक लोगो का रुझान इस विषय की तरह रहेगा ! जैसे : लैला-मजनू ,शीरीं-फ़रहाद, हीर-रांझा ,रोमिओ-जूलियट ,बीशलदेव रासो,परमाल रासो,पृथ्वीराज रासो,पद्मावती ,सूरसागर…
View On WordPress
Open;.;
—No, no soy drogadicto. No me acosté con esa persona. Soy un estudiante de literatura solo que se me hizo tarde. ¿En serio luzco tan mal?—Él chico se observo y se volvió a observar múltiples veces. Si siempre le decían “Nerd” porque ahora le salían con aquello.
Coz this baby's so hyper. #alekh #love #family #happy
Good morning ABC from #alekh ! :) #baby #love