इस मिट्टी के ही है तू भी और में भी
एक दिन इस मिट्टी में ही मिल जाएंगे
इस जहान में तेरा साथ अगर मेरी इन लकीरों में नहीं तो क्या
हम मर कर इस ही माटी में अपना आशिया बसाएंगे
जब सागर किनारे बैठे हम जैसे ही लोग
हमे अपनी मुट्ठी से उठाएंगे
हर बंधन तोड़ सब रस्में छोड़
हम बाघी हो कर उनकी हथेली से फिसल फिर एक हो जाएंगे
इस मिट्टी के ही है तू भी और में भी
एक दिन इस मिट्टी में ही मिल जाएंगे
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