फ़िरदौस, आज मैं ज़रा देर से घर आया।
दुकान से छूटने के बाद मैंने भाई को मानव के साथ भेजा घर पर और मैं घाट को चला आया। माफ़ी यहां के लोग रिवरफ्रंट कहते हैं।
आज तुम्हारी अनुपस्थिति का पहाड़ मेरी दुकान तक आया था। मैं कंप्यूटर पर कुछ स्टिकर्स निकाल रहा था और वो मेरे सर पर आ कर टूट गया। मैं निस्तब्ध हो गया। सुन्न पड़ गया। मेरा तन अचानक से ठंडा हो गया और मेरी ज़ुबान मौन हो गयी।
रात होते-होते मैं रात होता रहा। रात सा खाली लेकिन तुम्हारी स्मृतियों से पूर्ण। अंधेरे सा काला किंतु तुम्हारे प्रकाश में लहराता। सुध खो कर मैंने अपनी ग्रे जुपिटर में चाबी डाली और सीधा घाट पर जा कर रोकी।
मैंने साबरमती देखी काली। ऊपर आकाश देखा काला। तारों से विहीन वाला काला। मन में एक प्रश्न आया मेरे के;
यदि नदियाँ आकाश का दर्पण नहीं तो क्या है?
तुम होती तो शायद मेरी बात में हामी भरते हुए कहती;
"इस हिसाब से तुम मेरी नदी हो और मैं तुम्हारा आकाश।"
मैं प्रश्न करता,"वो कैसे?"
"हम दोनों एक दूजे के प्रतिबिंब हो कर भी कितने दूर हैं। नदी और आकाश ही हुए न, नहीं?"
मैं लंबी सांस ले कर तुम्हारी बात में मुंडी हिला कर हामी भरता।
कुछ देर साबरमती को देखता रहा मैं इस आशा में के तुम्हारी उपस्तिथि की चट्टान टकरा जाएगी मेरे पैरों से बेसुध हो कर परंतु मुझे दिखी साबरमती में एक हिलती हुई रोशनी। स्थिर साबरमती में अस्थिर रोशनी मुझ को पुकारती हुई।
मैंने देखा वो रोशनी कृत्रिम नहीं थी। वह चाँद की रोशनी थी। मेरा हृदय खुशी से गदगद हुआ तो लाज़िम था मेरे अधरों का दोनों कानों तक जाना।
मैंने चाँद देखा फिर रोशनी देखी। फिर चाँद देखा फिर रोशनी देखी। रोशनी अपना रूप बदल कर मछली हो गई और तुम आकाश से मुझे संतोष संग निहारने लगी।
मैंने आज पहली बार काली साबरमती में सफेद मछली देखी।
-निकम्मा।
















