लिए बिना ही अपना छाता
पलक झपकते ही सालों निकल गए मेरे अपनों के चेहरे बदल गए चलता चलता मैं इतना दूर निकल गया पता भी नहीं चला खुशी क्या है ग़म है क्या
एक "कल" जो बीत गया एक "कल" जो अभी आया ही नहीं दिमाग़ इस "कल" में ही फ़सा रहा जबकि ये दोनों असल में, हैं कहीं भी नहीं
हम हर पल साँसे "आज" में लेते हैं हम हर सुबह आखें "आज" में खोलते हैं हर समय सिर्फ "आज" ही होता है और जो इस आज में नहीं वह कहीं भी नहीं होता हैं
कभी कभी जिंदगी में हम भटक जाते हैं कभी कभी किसी बात पर हम अटक जाते हैं लौट कर आना होता है हमें "आज" पर हर बार तब ही मिल पाती है हमें अपनी रफ़्तार
पवन जो हमें हर पल छूती है बादलों की ये बारिश हर पल भिगोती है मैं अब इस बारिश को "कल" में नहीं पाता निकल पड़ता हूँ “आज” ही आसमां के नीचे, लिए बिना ही अपना छाता
~ राहुल सिंह











