गुनगुनी धूप के महीने में
कॉफी हाउस की सीढ़ियों पर
तुमने मेरी तस्वीरें खींची थी
हर तस्वीर के बाद मेरे बालों को ठीक करना
तुम्हारा उस क्षण के साथ पूर्ण न्याय था
सीढ़ियों से नीचे उतरते वक़्त
मेरा हेयर पिन अटक गया था
तुम्हारे ब्लेजर के ब्रोच पर
एक हाथ से मेरे चेहरे पर
गिरे बालों को हटाते हुए
'दारुण शुन्दोर' तुमने कहा
हज़ारों वर्षों पूर्व ही तस्वीरों की भाषा में
उन क्षणों का काव्यात्मक स्वरूप
सहेज लिया गया था
उस शाम की आजीवन स्मृतियाँ
हमारी तस्वीरों के भावमयी अनुवाद हैं।
~ नन्दिता सरकार









