सप्त भय का व्यापार संसार है
इहलोक का भय उन सभी जीवों को है जो जीने के लिए आहार, रोजगार और सुविधाओं के लिए निरंतर दौड़ रहे है ।
पर लोक का भय उन सभी जीवों को है जो इस भव में सुविधा जुटा पाए अथवा नहीं । जो सुविधा जुटा पाए वह और जुटाना चाहते है या फिर उसे संजोए रखना चाहते है ; और जो सुविधा जुटा नहीं पाए वह अगले भव में इस उम्मीद से पुण्य करते है अथवा कम पाप करते है ताकि अगले भव में वह जुटा पाए। जो मात्र पाप ही करता है वह मात्र इस कारण से पाप करता ही जाता है क्योंकि उस अगले भव में होने वाले पाप के फल से अनजान है अर्थात अध्यवसान है जो सभी भयो का एक मात्र कारण है ।
अरक्षा का भय , अगुप्ति का भय (बदनामी), मरण का भय, अकस्मात का भय और वेदना का भय ।
अहो! संसार के सारे व्यापार मात्र इन भयो के सहारे ही चल रहे है । किसी उद्योग में किसी एक भय की मुख्यता है और किसी उद्योग में सर्व भयो की मुख्यता है । इन सप्त भयो के सहारे होने वाले आदान प्रदान का नाम ही संसार है । अहो ! ऐसे आदान प्रदान का जो व्यापार है और जिस आधार से इनका अर्थ सार्थक है उस अर्थ को इस संसार ने मुद्रा अर्थात पैसे का नाम से दिया।
जैसे बॉलीवुड आदि फिल्मों का आधार अगुप्ति भय मुख्य और बाकी भय गौण है । आंतक का आधार मरण भय मुख्य और बाकी भय गौण है , चोरी का आधार अरक्षा का भय है क्योंकि जो संग्रह है वह चला न जाए, आजीविका का आधार इह लोक का भय है, उसी प्रकार पुण्य का आधार पर लोक का भय है , रोग का आधार वेदना का भय है और झटका लगने का आधार अकस्मात का भय।
वेदना का भय डॉक्टर्स का व्यापार चलाता है , परलोक का भय मंदिरों और मदरसों आदि के माध्यम से दान आदि का व्यापार चलाते है, इह लोक का भय रोजगार, खाना, पीना, रहना आदि आजीविका नौकरी चाकरी का व्यापार चलाते है , मरण का भय आतंक और बल का व्यापार चलाते है, अक्समात का भय अंध विश्वास, ढोंग आदि का व्यापार चलाते है , अगुप्ति का भय वैश्या वृत्ति , अश्लीलता, फिल्मों आदि का व्यापार चलाते है ।
ऐसे ही सात भयो के लिए जीव 24 घंटे इसी व्यापार और इसी व्यापार के विकल्पों में लगा रहता है ।
इस भय के कारण व्यापार अर्थात मोह वश योग अर्थात हलन चलन करता है। इसी मोह को पूरा करने के लिए योग्य देह के कारण आहार कर उसे स्वस्थ रखता है । और इसी देह से उसके ही जैसे देह का जन्म हो ताकि यह व्यापार जो उसने चलाया है अब उसका ही अंश चलाए इसलिए मैथुन करता है और यह जीवन इसी मोह के वश चलता रहे इसलिए परिग्रह करता है । अहो, एक अध्यवसान जो सातों भय का मूल कारण है और उस अध्यवसान का मूल कारण मिथ्या त्व है और उसी मिथ्या त्व के कारण निरंतर अध्यवसान और उसी अध्यवसान के दो रूप अर्थात संशय जहां एक देश अध्यवसान रहता ही है और विपर्यय, जो बिना अध्यवसान के साथ संभव ही नहीं।
सम्यक दृष्टि यदि रस्सी को सांप भी समझ ले तब भी उसका वह ज्ञान विपर्यय नहीं कहलाता है जबकि वह ज्ञान की अस्थिरता की श्रेणी में आता है ।
ज्ञान अस्थिर है अर्थात ज्ञान का जो आधार अपना द्रव्य है वह तो भली भांति वेदन में आ रहा है जबकि अस्थिर परिणाम के कारण यथार्थ जान नहीं पा रहा है और वह कुछ समय का और अधिकतम 6माह का ही भ्रम हो सकता है , उससे अधिक नहीं। अनंत काल के आगे 6 माह का समय न के बराबर होने के कारण वह अस्थिरता ही जानना।सम्यक दृष्टि के आठ अंग में इसलिए सबसे पहले नि:शंकित अंग की चर्चा प्रमुख है क्योंकि सम्यक दृष्टि सप्त भय मुक्त होता है । सम्यक दृष्टि जानता है कि उसे इस लोक में जीने के लिए किसी व्यापार की आवश्यकता नहीं और जितनी भूमिका वश आवश्यकता है वह भी अस्थिरता का ही परिणाम है इसलिए उसे ईहलोक का भय नहीं। सम्यक दृष्टि जानता है कि जैसे कर्म किए है वैसा ही भव बंधेंगा इसलिए उसे परलोक का भय भी नहीं। सम्यक दृष्टि कुछ भी छुपाता नहीं इसलिए उसे अगुप्ति का भय भी नहीं रहता। सम्यक दृष्टि जानता है कि कोई मेरा कुछ भी बिगाड़ सकता नहीं इसलिए उसे अरक्षा का भय भी नहीं होता है। सम्यक दृष्टि जब देह को ही अपनी नहीं मानता तो उसे वेदना का भय भी नहीं होता है । सम्यकदृष्टि जानता है कि इस संसार में सब कुछ निश्चित है और सब कुछ वस्तु के स्वभाव के अनुरूप ही होता है और यहां किसी अकस्मात का होना संभव ही नहीं इसलिए उसे अकस्मात का भय भी नहीं होता है । और देह जब उसकी है ही नहीं तो उसके मरण का भय भी सम्यक दृष्टि को होता नहीं है ।
अहो, ऐसे नि:शंकित अंग का धारी सम्यक दृष्टि होता है । और इसके अतिरिक्त सम्यक दृष्टि नि:कांक्षित, निर्वचिक्तसा, उपगुहन, अमूढ़ दृष्टि, स्थितिकरण, वात्सल्य और प्रभावना आठ अंग सम्यक दृष्टि में मुख्य रूप से होते ही होते है ।