न कहें "कमज़ोर है"
लम्बे समय तक दुःख सहते सहते मन को दुखों की आदत सी हो जाती है सुख के आने की जरा सी आहट से ही मन की तबियत बिगड़ सी जाती है
मन सिर्फ, सिर्फ भागता रहता है यह कभी प्रशंसा चाहता है तो कभी सहानुभूति उसे मालूम ही नहीं, कि वह इन दोनों से परे है गर स्थिर हो जाये तो मिलती है बड़ी अनुभूति
क्या मन इतना कमज़ोर है की हाथों से छुटे और जमीं पर बैठ जाये जो निमिष मात्र में ब्रह्माण्ड की सरहदों को छू आए क्या उससे भी कभी जमीं पर बैठा जाए
बाहरी आक्रमण से अपने मन को सिमटने न दे अपने अच्छे विचारों से इसे बल दे निडरता ही इसकी माँ है इसे अपनी माँ से दूर न जाने दे
अपने आपको और अपने मन को न कहें "कमज़ोर है" याद रखें मन की गति प्रकाश से भी पुरज़ोर है
~ राहुल सिंह













