How to keep new year resolution - Astrological reasoning
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How to keep new year resolution - Astrological reasoning
Astrologer Sidharth Jagannath Joshi
Astrologer Sidharth
नमस्कार
आधुनिक ज्योतिष निबंध पुस्तक का किंडल संस्करण 5, 6 और 7 मई को मित्रों के लिए नि:शुल्क उपलब्ध होगा। पिछली बार 197 मित्रों ने इस योजना का लाभ उठाया, लेकिन काफी सारे मित्र चूक भी गए, इस बार तीन दिन तक अमेजन के प्रमोशन के तहत यह पुस्तक नि:शुल्क उपलब्ध हो पाएगी।
कृपया ध्यान दें, यह पुस्तक प्रिंट वर्शन में नहीं है, केवल किंडल वर्शन है, यानी आप इसे केवल अमेजन की किंडल डिवाइस अथवा मोबाइल में किंडल एप्प में ही पढ़ सकते हैं। अपने मोबाइल पर आप प्ले स्टोर अथवा एप्प स्टोर से अमेजन किंडल एप्प डाउनलोड कीजिए, उसमें अपने अमेजन अकाउंट से लॉगइन कीजिए और adhunik jyotish nibandh सर्च कीजिए, आपको यह पुस्तक शून्य कीमत पर उपलब्ध दिखाई देगी। इसकी खरीदी कर डाउनलोड करके रख लीजिए, यह आपके पास ही रहेगी, बाद में पढ़ सकते हैं।
पुस्तक का लिंक यहां भी मिल जाएगा.... https://www.amazon.in/dp/B07LCT5C4W
पढ़ने के बाद अगर अच्छी लगे तो रिवीव भी लिखिएगा। अगर आप कुछ अच्छी बात लिखकर मुझे भी भेजते हैं तो मैं अपनी वेबसाइट पर आपके नाम से लगाना चाहूंगा।
सादर
सिद्धार्थ
ये ज्योतिष दर्शन पुस्तक का दूसरा और किंडल एडीशन है जिन मित्रों को पूर्व में लिखी ज्योतिष दर्शन पुस्तक नहीं मिली थी और जिन पाठकों ने ज्योतिष दर्शन पुस्तक को सराहा था और ज्योतिष विषय के सुधि पाठकों के लिए सूचना कि ज्योतिष दर्शन पुस्तक का किंडल एडीशन आधुनिक ज्योतिष निबंध के रूप में आया है, पूर्व में जहां 35 लेखों को शामिल किया गया था, वहीं इस दूसरे एडीशन में 49 लेख शामिल किए गए हैं। जिन मित्रों ने पहला एडीशन खरीदा था, वे दूसरा संस्करण भी खरीदें, उपयोगी ही साबित होगा, जो मित्र पहले खरीदने से चूक गए थे, वे अब खरीद लें और नए पाठकों का स्वागत है... आप सभी का स्नेह बना रहे। https://www.amazon.in/dp/B07LCT5C4W
(अक्षय तृतीया का अबूझ मुहूर्त के ज़रिये)
(व्यवसाय का चुनाव : ज्योतिषीय दृष्टिकोण के ज़रिये)
...तो हम सूर्य के प्रकाश में नहाते और संसार का हर खाद्यान्न-संकट मिट जाता
…तो हम सूर्य के प्रकाश में नहाते और संसार का हर खाद्यान्न-संकट मिट जाता
…तो हम सूर्य के प्रकाश में नहाते और संसार का हर खाद्यान्न-संकट मिट जाता Problem of hunger ‘कोई मिल गया’ में नीला एलियन जादू सूर्य के प्रकाश से शक्ति पाता है। फ़िल्मकार उसे पौधों की तरह अपनी ऊर्जा का निर्माता दिखाते हैं। यह निर्माता की सोच बताता है : प्राकृतिक रूप से सर्वाधिक स्वावलम्बी होना सर्वाधिक शक्तिशाली होना भी है। जीवन का सबसे बड़ा चमत्कार प्रकाश से भोजन-रूपी पदार्थ बना लेना है। दुनिया की…
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औसत होना हमें डराता है औसत होना हमें डराता है The Fallacy Of Being Special पापा बेटे-बेटी से कहते हैं : तुम दुनिया के सबसे अच्छे सन-डॉटर हो। वाइफ़ हस्बैंड से यही कहती है, हस्बैंड वाइफ़ से। व्यक्ति देश की जय बोलते समय यही संवाद नारा बनाकर बोलता है। इकाई से भीड़ की ओर बढ़ते जाइए, यह 'यू आर द बेस्ट' अथवा 'यू आर द चोज़ेन वन' का शोर बढ़ता जाएगा। शिक्षा भी इसी नीति का अनुसरण करती है कि हर बच्चा प्रतिभा का भाण्डार है। हर बच्चा कुछ कर सकता है, वह कुछ विशिष्टताएँ समेटे है। हर आदमी-औरत में एक सुपरहीरो है, फ़िल्में हमें विश्वास दिलाती हैं। वे नायक का अनुसरण-अनुकरण करने को नहीं कहतीं, वे नायक हो जाने के लिए उत्प्रेरित करती हैं। विशिष्टता छद्म ही सही, लेकिन विश्वास का संचार करती है। आशा के उजाले में लोग जीवन जीना आसान समझते हैं। इसलिए तुम सबसे अच्छे भाई हो, बहन हो, पति हो, पत्नी हो, माँ हो, बाप हो --- का पब्लिक डिस्प्ले ऑफ़ एफ़ेक्शन लोग खुलकर करते हैं। यह अभिव्यक्ति है यह दिखाने की कि मैं कितना / कितनी ख़ुश हूँ, आप मेरे फ़ोटोग्राफ़ों में देख सकते हैं। मैं आनन्द के सागर में गोते लगा रही / रहा हूँ। यिप्पी ! लेकिन फ़ोटोग्राफ़ों में आपका मन नहीं दिखता, मन की असुरक्षा नहीं दिखती। 'आ जाओ ऑन द बीच, यार फ़ोटो मेरी खींच' --- में वह पानी नहीं नज़र आता, जो गला चोक कर रहा है और जिसके कारण कोई मुस्कुराते हुए खाँस भी नहीं पा रहा। से चीज़! आप माने-न माने, अँधेरा आपके चारों ओर पहले से बढ़ा है। आपकी छाया पहले से अधिक घनेरी हुई है, बस वह आपके पीछे चलती है। सामने रंग-रंग की लाइटें हैं, आपकी आँखों को उन्हें देखते हुए जीवन बिता डालना है। पीछे मत देखिएगा, नहीं तो फिर आगे बढ़ा न जाएगा, न प्रकाश को देखा जाएगा। दुनिया के साउण्ड-लाइट-शो को वह कोई आदमी नहीं देख सकता, जिसने अपनी शैडो का भुतहा शो देख लिया हो। हम सदियों धर्म के तले जीवन जीते आये हैं। उसने हमें विशिष्टता की अनुभूति कराये रखी। 'बड़े भाग मानुस तन पावा' --- हमें रोमांचित करता रहा। जातियाँ-कुल-नस्ल हमें ऊँच-नीच के बोध से ग्रस्त करते रहे। फिर अचानक कुछ लोग औसत की बात करने लगे। ये मरदूद वैज्ञानिक कहलाते थे। इन्होंने कहा कि तुम ख़ास नहीं हो, औसत हो। तुम्हारा परिवार औसत है, तुम्हारा मोहल्ला औसत है, तुम्हारे लोग औसत हैं। तुम्हारा देश औसत है, तुम्हारा ग्रह औसत है। तुम्हारा सूर्य भी औसत है, तुम्हारी आकाशगंगा भी। अपने आप को सिर्फ़ इसलिए विशिष्ट न मानो कि तुम-सा कोई तुम्हें मिला नहीं। लेकिन ये बातें हुए-बीते भी ज़माना हुआ। अब लोग सामान्यता को इस रूप में मान चुके हैं। पर फिर उन्हें कुछ नये लोग पिछले कई सालों से बता रहे हैं कि तुम विशिष्ट हो, सबसे विशिष्ट। हर आदमी जो आपकी विशिष्टता आपको सुना रहा है, साथ में जोड़ दे रहा है --- "आइ ऐम सो सो प्राउड ऑफ़ यू !" मैं आपसे गौरान्वित महसूस कर रहा हूँ, इसलिए आप बने रहिए। टूटिएगा नहीं, दरकिएगा भी नहीं। मैं हूँ न ! आपको सम्भालूँगा, आपको बचा लूँगा। आपको बताता रहूँगा कि आप सबसे स्पेशल हैं। मैं इस लेख में निर्णयवादी नहीं हो रहा, यह लेख सनक के कारण नहीं लिखा जा रहा। यह लेख अपने ही साये को साउण्ड-लाइट-शो का किरदार बनाने की कोशिश है। कि आगे आओ, कब तक पीछे से लोगों को डराते रहोगे भाई ! लेकिन समस्या यह है हर आदमी अपने साये के साथ शो में अकेला, नितान्त अकेला होता जा रहा है। माई लाइफ़, माई रूल्ज़ के मन्त्र के साथ माई शैडो का प्रच्छन्न फ़्रेज़ संलग्न है। मैं इस बात को हमेशा मानता हूँ कि विज्ञान आपको सबसे जोड़कर भी निस्संगता देता है। वह आपमें स्वार्थ की वृत्ति पोसता है। लेकिन यही काम धर्म भी करता था, बस वह आपको आपके कामों की ज़िम्मेदारी भी याद दिलाता रहता था। लेकिन साइंस कर्म को किसी नीति से नहीं जोड़ती, वह बस आपको आपकी सुविधाएँ बताती-दिला देती है। अब यह आप पर है कि टीके बनाएँ या जैविक हथियार ! धर्म के युग में अँधेरा अलग मेल का था, आज उसका प्रकार दूसरा है। जब सुविधा सर्वाधिक स्वार्थी होती है, तो वह सुविधाभोगी को सबसे कमज़ोर करती है। आप मौज की मौजों में ऊपर-नीचे तो होते हैं, लेकिन तैर नहीं रहे होते। आपको लहरें ऊपर-नीचे फेंक रही होती हैं। आपने अपने आप को लेट लूज़ नहीं किया, आपने अपने आप को हर तरह से यूज़ किया। यह अकेलापन अभी और बढ़ेगा। दुनिया अभी जवान है, पार्टी अभी शुरू हुई है। अगले बीस साल के भीतर इस प्रोसेस्ड जीवन के आपको दुष्प्रभाव हर ओर भरपूर दिखेंगे। नशा हर नियम तोड़ेगा, लोग रिक्रिएशन को साइंस से जोड़कर उसे सही ठहराएँगे। दो-तीन पीढ़ियाँ इसमें तबाह हो जाएँगी। तब हमारे गत रिक्रिएशनल जीवन की गलन को देखकर कोई नया बच्चा हमसे पूछेगा : आपने क्रिएट क्या किया अपने जीवन में, रिक्रिएट तो बहुत किया?
आओ सिखाएँ तुम्हें अण्डे का फण्डा
आओ सिखाएँ तुम्हें अण्डे का फण्डा about Egg अण्डे से जीव की उत्पत्ति की बात सदियों से लोगों को पता है । यूनिवर्स को हम आज बिग बैंग से पैदा भले मानते हों , लेकिन पुराने लोग किसी स्वर्णिम अण्डे से समस्त सृष्टि का जन्म मानते रहे हैं। यहाँ तक कि बिग बैंग को भी कॉस्मिक एग कह दिया जाता है , भले ही उसमें सामान्य अण्डे-जैसा दिखने में कुछ भी न हो। भारतीय शब्द ‘ब्रह्माण्ड = ब्रह्म का अण्ड’ इसी सोच के आधार…
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नायक तो निर्दोष नहीं हैं , लेकिन ...
नायक तो निर्दोष नहीं हैं , लेकिन …
नायक तो निर्दोष नहीं हैं , लेकिन… Responsibility of role models आरम्भ के साथ ही जीवन के सूत्र हमें नायकों के बीच ले जाते हैं। हर उम्र का अलग हीरो, हर उम्र की अलग दृष्टि के अनुसार। छोटे बच्चों के नायक अपने पन्थ से निकालकर उनके माँ-बाप देते हैं। जो पन्थहीन सजग परिवारों में पल रहे हैं , वे कार्टून-किरदारों को नायक मान लेते हैं। बचपन में पौष्टिक भोजन के साथ पुष्ट नायकत्व भी चाहिए होता है। वह जिसके…
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हिंदी : ऑनलाइन बनाम ऑफलाइन
हिंदी : ऑनलाइन बनाम ऑफलाइन Hindi : Online Vs Offline मेरी तरह ही कुछ और लोगों को भी बुरा लग रहा होगा कि इंटरनेट पर पिछले आठ दस साल से लगातार हिंदी पेलते रहते और लाखों की संख्या में पाठकों को जुटा लेने के बावजूद हिंदी ब्लॉगरों को न तो ऑफलाइन समारोहों में शामिल होने के काबिल समझा जा रहा है न इन समारोहों से सीख लेने के… इंटरनेट पर सक्रिय अधिकांश हिंदी वाले जानते हैं कि हिंदी पट्टी के 90 प्रतिशत…
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हिंदी की मुफ्तखोरी
हिंदी की मुफ्तखोरी Blogging Sphere in hindi बहुत साल पहले की बात है, एक इंटरनेट जंगल हुआ करता था, इसमें बहुत से पक्षी कच्ची पक्की रागें सुनाया करते थे, किसी का अलाप श्रेष्ठ था तो किसी का सुर पक्का था कोई बैठे गले से गाता था तो कुछ पंचम सुर वाले भी थे… इंटरनेट जंगल में इससे कुछ पहले बहुत सूनापन था, क्योंकि ब्लॉगिंग का कोई प्लेटफार्म नहीं था, सो गूगल गुरु ने अपनी साधना के बल पर प्लेटफार्म…
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सेल्फी इस सदी की सबसे बड़ी त्रासदी है
सेल्फी इस सदी की सबसे बड़ी त्रासदी है Selfi is the biggest disaster of the century आपने पिछले पांच छह सालों में एक दो नहीं बल्कि सैकड़ों स्थानों पर इस प्रकार का लेख पढ़ा पढ़ा होगा। चलिए इस मुद्दे पर आगे बात करने से पहले आपको रिसर्च इंस्टीट्यूट के बारे में बताना चाहूंगा। हर रिसर्च इंस्टीट्यूट में एक भाग आवश्यक रूप से होता है, उसे कहते हैं एक्सटेंशन एज्युकेशन यानी शिक्षा प्रसार। इसका क्या…
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यूं ही कोई बेवफा नहीं होता
यूं ही कोई बेवफा नहीं होता Adarsh liberals on Award wapsi धननन्द का शासन था, आमजन पर अत्याचार बढ़ता जा रहा था, सरकारी मशीनरी का कोई भी बंदा किसी भी आम इंसान के साथ बदसलूकी कर लेता था, यहां तक कि राज्य के आचार्यों तक को इज्जत मिलनी बंद हो गई। जो आचार्य भिक्षा से जीवन यापन करते थे, वे मगध की उन्नति केवल इसलिए करना चाहते थे, क्योंकि मगध राज्य में उन्हें सम्मान मिलता था। इसी सम्मान के भरोसे…
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बरखा दत्त की किताब बरखा दत्त की किताब Book Written by barkha dutt बरखा दत्त की किताब आई है। जिसमे उसने खुलासा किया है कि बचपन में उसके साथ यौन शोषण की घटना हुई थी। किताब में ही एक सर्वे के हवाले से बताया गया है कि देश के 53 प्रतिशत बच्चे यौन शोषण का शिकार होते हैं। मैं यह नहीं कहता कि बरखा दत्त गलत कह रही है लेकिन उसने ना तो अपने रिश्तेदार का नाम बताया और ना ही उसके खिलाफ किसी प्रकार की कारवाई की बात की है। वे किसे बचाने का प्रयास कर रही हैं। खुद के बलात्कारी को? देखने की बात यह है की यह किताब वास्तव में समाज को क्या संदेश देना चाहती है। यहां मैं बाजार तंत्र को खड़ा हुआ देखता हूं। यह वही बाजार है जिसने संयुक्त परिवारों के उत्पादों दरकिनार कर ऐसे उत्पाद पेश किए जो केवल nuclear फैमिली के लिए ही उपयोगी साबित हो सकते हैं। परिवारों का जितना अधिक बिखराव होगा बाजार उतनी ही अधिक गति से छोटे पैकिंग वाले महंगे उत्पाद बनाकर बेच सकेगा। बाजार की बहुत अधिक कोशिशों के बावजूद भी भारत में अब भी संयुक्त परिवार बने हुए हैं। हालांकि अब एक ही दादा का परिवार या परदादा का परिवार एक छत के नीचे नहीं रहता लेकिन एक पिता की सभी संताने अब भी बड़ा घर बना कर एक जगह रहने का प्रयास करती है ऐसे में परिवार के बीच संबंधों में शंका कैसे पैदा की जाए इसके लिए यह पुस्तक निश्चय ही उपयोगी साबित हो सकती है। हमारे देश में दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं होती हैं। लेकिन उनका सामान्यीकरण करना कहाँ तक उचित है। 53 प्रतिशत बच्चे यौन शोषण का शिकार होते हैं। यानी हर दूसरा आदमी शक के दायरे में है। मुझे अपने आस पास ये स्थिति दिखाई नहीं देती। क्या किसी परिवार में इतने बलात्कारी मिल जाएंगे। मेट्रो शहरों में जहां एकल परिवार हैं वहाँ कमोबेश अधिक भय होना चाहिए। संयुक्त परिवारों में ऐसी स्थितियां अपेक्षाकृत कम होनी चाहिए। क्या ये अभिभावकों के भय के दोहन का अस्त्र है। इस मुद्दे को दरकिनार करने के बजाय खुलकर विचार करना चाहिए। वरना हम एक और गलत धारणा और सामान्यीकरण के शिकार हो जाएंगे।
गुजरात चुनाव पर मेरा दो कौड़ी का मत
गुजरात चुनाव पर मेरा दो कौड़ी का मत Two penny thought on Gujrat election गुजरात जीत को अगर बीजेपी अपनी जीत मान रही है तो मुगालते में है, गुजरात हार को अगर कांग्रेसी अपनी हार मान रहे हैं तो वे भी मुगालते में हैं… मुद्दा पहले भी हिंदुत्व था, आज भी हिंदुत्व है, मोदीजी जिस रथ पर सवार होकर दिल्ली पहुंचे हैं, दिल्ली वालों ने उस रथ का कोना पकड़ लिया है… वाजपेयीजी को सेक्युलर चेहरे के साथ तीन बार…
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