क्यूँकि कुछ कह नहीं सकता।
क्यूँकि कुछ बचा नहीं कहने को।
वो ठंडी हवाएँ जो मुझे छू कर गुज़र जाती है
जब भी मैं तुम्हें याद करता हूँ।
या धूप का वो टुकड़ा जो खिड़की से मेरे कमरें में कभी-कभार आ कर झाँक जाता है,
जैसे कभी कभी तुम मुझे अनजाने में देख लिया करती थी।
शहर की वो गली जहाँ तुम्हारा घर है आज भी उसे बस दूर से देख कर अपना रास्ता बादल लेते हूँ,
जिस तरह हमारी बातें अक्सर रास्ता बदल कर ख़ामोशी की ओर बढ़ जाती थी।
या नदी किनारे घाट की वो सीढ़ी जहाँ आख़री बार तुम्हें बैठा देखा था,
जिस से आगे बढ़ जाने को आज भी दिल नहीं करता।
लिखने के लिए तो और भी बहुत कुछ है
लेकिन लिख कर कभी कुछ बचाया जा सका है?
इतिहास ने भी तो केवल संजोय रखी है ज़र-ज़र इमारतें और युद्ध के अवशेष,
शिरीन का फूटा हुआ मटका मिला है किसी को कभी?
या मजनूँ के इंतज़ार का हिसाब?
शायद कुछ बचा हुआ है और हमेशा बचा रहेगा तो वो है हमारे बीच का फ़ासला,
किसी अनंत छोर से दूसरे अनंत छोर पर किसी को देख भर लेने का फ़ासला।