साधक और साधना
साधक प्रश्नों से बटोहते रास्ते तय करता जाता है । साधना से प्रश्नों के उत्तर और आगे की राह तय करता है।
साधना अगर हो निरंतर, अचल, अटल, शास्वत तो उत्तर के आगे नये प्रश्नों को जन्म देती है ।
यह क्रमशः यूँही चलेगा प्रश्नों के उत्तर का और उत्तर से प्रश्नों का सृजन फिर क्यों ना मेरा मन कहे
कि साधक हूँ मैं अधूरा साधना भी मेरी है अधूरी । साधना जब हो तप समान फिर होगी भी कैसे वह पूरी ।
—- शशि







