जड़ से उखाड़ फैंका
मैं जब भी अपनी माँ के घर जाता हूँ मेरा रास्ता एक ही होता है लेकिन हर बार मुझे पैर में एक काँटा चुभता है इसका एहसास मुझे हर बार होता है
दशकों निकल गए और हर बार यह काँटा चुभता रहा हर बार दर्द के दंश का नृत्य होता रहा हर बार मैं कहराता रहा
आज मैं फिर अपने माँ के घर निकला हूँ उसी रास्ते से जिस पर हर बार जाता हूँ फिर मुझे यह काँटा चुभा और मैंने देखा लेकिन इस बार मैंने इसे जड़ से उखाड़ फैंका
~ राहुल सिंह


















