मोदी सरकार द्वारा लाए गए तीन कृषि कानूनों को लेकर विरोध जारी है, किसान अपनी मांग पर अड़े हैं तो सरकार अपनी ढिठाई पर। इसी बीच आज हम आपको यूपी के उन बदहाल किसानों का हाल बताएंगे जिनको भक्त मंडली सम्पन्न और देशप्रेमी बताने के लिए जी जान से लगी है। मामला धान की खरीद से है। योगी आदित्यनाथ जी ने दो महीने पहले कहा था कि प्रदेश के किसी भी किसान को एमएसपी से कम मूल्य पर अपने कृषि उत्पादन नहीं बेचना है। लेकिन ऐसा लगता है कि उन्होंने ये फ्लो-फ्लो में बोल दिया क्योंकि सच्चाई तो इसके ठीक उलट है। आंकड़ो से समझिए। यूपी सरकार ने इस साल 55 लाख टन धान खरीदने का लक्ष्य रखा था, खरीद शुरु हुए दो महीने से ज्यादा का वक्त बीत गया है लेकिन अभी तक 28.39 लाख टन यानी 50 फीसदी धान की ही खरीद हुई है। सरकारी रेट पर धान बेचने के लिए किसानों ने रजिस्ट्रेशन करवाया, दो महीने से ज्यादा का वक्त बीत जाने के बाद भी करीब साढ़े पांच लाख किसानों से खरीद नहीं हुई, खरीद की रफ्तार इतनी धीमी है कि एक दिन में केंद्र पर 2 से ज्यादा किसानों से खरीद ही नहीं हो पा रही है। एक फायरब्रांड मुख्यमंत्री के राज में इतनी धीमी खरीद पचती नहीं। सरकार ने धान का सरकारी भाव 1868 रुपए प्रति क्विटंल है, लेकिन खुले बाजार में यह 1000 से लेकर 1100 रुपए प्रति क्विंटल बिक रहा है। क्या ऐसा किसानों की आय दोगुनी करने के लिए किया जा रहा है? असल में सरकार इस लूट को ही कानूनी जामा पहनाने में जुटी है। सीधी और सरल बात है कि सरकार का ध्यान किसानों की उपज बढ़ाना या उचित मूल्य दिलवाना नहीं है बल्कि उसकी चिंता तो ये है कि कैसे खेती को निजी सेक्टर को सौंप दिया जाए। सत्ता पक्ष का ही नहीं बल्कि विपक्ष के भी किसी नेता ने ये सवाल नहीं उठाया कि आखिर यूपी में धान 1000 रुपए प्रति क्विंटल क्यों बिक रहा है। आप माने या न माने, सरकार की मंशा साफ है कि किसी तरह से खेत को भी पूंजीपतियों को सौंप दिया जाए, हां वही पूंजीपति जो देश की ऐसी तैसी करके विदेश भाग गए। जिनके हाथों मोदी सरकार ने एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन व सरकारी कंपनियां बेची है। किसानों की चिंता होती तो फसलों की उपज को बेचने की सुलभ व्यवस्था करते। उचित मूल्य दिलवाते, खेती में घाटा कम करने के लिए काम करते लेकिन यहां तो नया कानून बनाकर किसानों की ही मुसीबत को बढ़ा दिया है। उपज को बेचने की उचित व्यवस्था करने के बजाय पूंजीपतियों के हाथ बेचने का नया कानून ही बना डाला। सवाल आज भी वही है, कानून अच्छा है तो उसमें संशोधन क्यों कर रहे हो, अगर कानून खराब है तो उसे वापस क्यों नहीं ले रहे हो?












