बड़ी विडंबना है, एक समय अंग्रेजों के शासन से भारत की जनता को बस इसी बात का कष्ट था कि कुछ विदेशी लोग उनकी ही धरती पर आकर उन्हीं का खा पीकर उन्हें ही सता रहे थे और उन्हीं को लूट कर अपने घर भी भर रहे थे। उसके लिए तत्कालीन भारतीयों ने लोहा ले लिया, उन्हें खदेड़ कर बाहर का रास्ता दिखाया और खुद को आजाद समझ कर निश्चिन्त हो गए | लेकिन आज किसी को गुरेज नहीं है जबकि, अगर मैं गलत नहीं हूँ तो स्थिति आज भी कुछ खास नहीं बदली है |
कुछ विद्वानों के मतानुसार ‘भारत का संविधान’ 1935 का ‘भारत सरकार अधिनियम’ ही है, बस कुछ एक नियम घटा बढ़ा कर के उसी को आज भी चलाया जा रहा है | समझ में ये नहीं आता की भारतवासियों को अंग्रेजों से तकलीफ़ थी या उनके शासन से? उनके शासन के तौर तरीकों से? उनके बनाये नियम कानूनों से? क्योंकि ऐसे तमाम नियम और क़ानून जो तब शुरू किये गए थे, आज भी आजादी के 75-76 साल बाद भी प्रचलन में हैं, आज भी उन्ही नियमों पर इस देश की जनता को न्याय मिल रहा है | फिर आज क्यों लोगों को समस्या नहीं है, पिछले 75-76 सालों में किसी को समस्या क्यों नहीं हुई? आजादी के बाद लोगों ने इसको प्रतिस्थापित क्यों नहीं करवाया? क्या किसी के कह देने भर से ही हम आजाद हो गए हैं? क्या इसे आलस्य नहीं कहना चाहिए, कि हम आज तक उन नियमों को नहीं बदल पाए?
निस्संदेह ही ये आलस्य है, और इसी आलस्य की देन है कि आज हम अपनी संस्कृति को खोते जा रहे हैं | यही वजह है कि आज के युवा हिंदी के शब्दों पर हँसते हैं और अंग्रेजी बोलने में खुद को गर्वान्वित महशूस करते हैं | अंग्रेजी आधुनिकता का पर्याय बनती जा रही है और देशज भाषाएं रूढ़िवादिता का | और जिस तीव्रता के साथ देशज भाषाएं और बोलियां विलुप्त हो रही हैं, जिस तीव्रता से हमारे संस्कार पाश्चात्य संस्कृति को अपनाने में विलुप्त होते जा रहे हैं, जिस तीव्रता से ये भारत-भूमि अपनी विविधता को खोती जा रही है, डर लगता है संभलने में हमें देर न हो जाए, कहीं हमारा ये आलस्य भारत-भूमि पर ही हमें पाश्चात्य संस्कृति जीने पर मजबूर न कर दे, डर लगता है मैकाले का देखा सपना सच न हो जाय, डर लगता है ये दुनिया फिर से एक संस्कृति न खो बैठे, कहीं एक अनोखी संस्कृति फिर से हड़प्पा-मोहनजोदाड़ो न बन जाए। और ये सिर्फ भारतवर्ष के लिए ही चिंता का विषय नहीं है बल्कि पूरे विश्व के लिए चिंता का विषय है | लेकिन तभी जब विश्व को इतिहास में एक और विलुप्त संस्कृति का विस्तृत अध्याय जोड़ने का शौक न हो | अगर शौक है तो फिर तो ठीक है, आशा करता हूँ निकट भविष्य में, बहुत जल्द ही ये ख्वाहिस पूरी हो जायेगी | क्योंकि इस देश के लगभग आधे या आधे से अधिक लोग मात्र 75 साल में ही पश्चिमीकरण का शिकार हो चुके हैं, और गतिकी के नियमों को नजर-अंदाज न करते हुए, इस बदलाव की तीव्रता को ध्यान में रखकर सोचें तो शेष 50 प्रतिशत को पश्चिमीकृत होने के लिए 50 साल बहुत हो जाएंगे |
देश की आजादी के इतने साल बाद भी इस देश में 194.6 मिलियन लोग प्रतिदिन भूखे सोते हैं, गरीब आज भी परेशान है, किसान आज भी मर रहे हैं, महिलायें आज भी हैवानियत का शिकार हो रही हैं और इन्साफ के लिए आज भी एक आम-आदमी लालायित है, दंगे फसाद आज भी होते हैं, किये और कराये जाते हैं, किये जा रहे हैं और तमाम लोग बेमौत मर रहे हैं लेकिन किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि किसी ने बता दिया था कि हम 1947 में ही आज़ाद हो गए थे, और हमने समझ लिया था कि आजाद होने के बाद हमें कुछ करना शेष ही नहीं रहा, जो कुछ होगा वो सब हमारी खुद की सरकार कर देगी हमारे लिए।और सरकार क्या कर रही है?सरकार डट कर उसी अपनेपन का फायदा उठा रही है, सोशल इंजीनियरिंग और इमोशनल इंटेलिजेंस में रिसर्च कर करा कर जनता को बेवकूफ बना रही है, ठीक वैसे ही जैसे अंग्रेजी हुकूमत बनाती थी | और ये सब बस इसलिए हो रहा है और होता रहेगा कि हम स्वार्थी थे, स्वार्थी हैं और स्वार्थी ही बने रहना चाहते हैं | हमें बस इतनी ही बात से मतलब है कि हमारा पेट भरता है या नहीं, हमारी अय्यासी पूरी हो जाती है या नहीं | हमें फर्क ही नहीं पड़ता हमारे दरवाजे के सामने कौन रात की शर्दी में दम तोड़ता है, क्यों तोड़ता है और उसके दम तोड़ने के बाद कितने लोग उसके गम में दम तोड़ने को मजबूर हो जाते हैं |
दिन दहाड़े, पुलिस और तमाम राजनेताओं की आगोश में लिपटा रहने वाला कोई शख़्स जनता के करोड़ों-अरबों रूपये लेकर चम्पत हो जाता है, दिन दहाड़े कोई भी किसी को भी मार-काट देता है, और जनता को बेवकूफ समझने वाले ये लतखोर और बेहया किश्म के लोग इन सारे संगीन अपराधों को मामूली लतीफा बनाकर छोड़ देते हैं, तो क्यों ? क्योंकि इन्हे सिर्फ अपनी ऐयाशियों से मतलब है। इन्हे बहुत अच्छी तरह से पता है कि पैसा किसानों, मजदूरों और फैक्ट्रीज में काम करने वाले लोगों, भारत के उन आम लोगों के खून पसीने से आता है | इसीलिए ये डरपोक नहीं चाहते की आम जनता उतनी शिक्षित हो के ये सारा खेल समझ जाए और इनका पत्ता काट दे और इसीलिए ये लोग शिक्षित करना ही नहीं चाहते ।
और सबसे बड़ी विडम्बना तो ये है कि कागज़ के एक टुकड़े को ही हम शिक्षित होने का सुबूत मानने लगे है | ये भी इसी बात का फायदा उठा कर ऐसे ही कागज़ बनाने के कारखाने खोलने लग गए हैं और यही कागजी आंकड़े शिक्षित और अशिक्षित का प्रतिशत तय करने लगे हैं और हमें सुनहले अक्षरों में घोल कर पिलाये जाने लगे हैं | कोई कहता है हमारी सरकार में देश ने शिक्षा के क्षेत्र में इतने प्रतिशत की वृद्धि की तो अगला उससे दो कदम बढ़ के बताता है, लेकिन हकीकत क्या है, ये देश के लगभग हर प्राथमिक विद्यालय में जाने और पूछताछ करने पर दिख जाता है, जब एक शिक्षक/शिक्षिका ही देश की राजधानी लखनऊ बताता/बताती है |
शिक्षा के नाम पर देश भर में तरह- तरह के कार्यक्रम और योजनाएँ चलाई गई और चलाई जा रही हैं लेकिन सब विफल हैं। परन्तु फिर भी सबका मूल्यांकन बन्दर-बाँट सिद्धांत के अनुसार कर के दो चार जगह अच्छी तसवीरें जड़वाकर देश को दिखा दिया जाता है, कि सरकार ने जैसे तीर ही मार लिया हो और गरीब भी ये सोच कर मौन रह जाता है के शायद मेरी कमाई से ऊपर की चीज रही हो।
गरीब को सरकारी मदद के नाम पर भीख दी जा रही है फिर उसमें भी पचहत्तर हवसी अपना-अपना हिस्सा लगाए बैठे हैं | अंततः जो सब खा-पचाकर अपशिष्ट छोड़ देते हैं, वही देश के गरीब के गले उतरता है | लेकिन इससे क्या, हम तो आजाद हैं…… 1947 में ही हो गए थे, अच्छे दिन तो अब बस आने ही को हैं, गाडी थोड़ी लेट हो गयी है जैसा कि अक्सर और लगभग सभी रेलवे स्टेशन पर होती ही रहती है |
आये दिन देश के किसी न किसी हिस्से में अनावश्यक रूप से किसी नागरिक की जान जाती है लेकिन जनता के ये नेता जिन्हें जनता ने जन-नेतृत्व की जिम्मेदारी दी है, वो क्या करते हैं? अपनी कुर्सी के मद में मदमस्त हैं. उन्हें अपनी पार्टी की सरकार चाहिए बस, चाहे जैसे भी, दंगा जरूरी होगा तो दंगा भी करवाएंगे क्योंकि जनता का खून तो अफरात है ही उनके समर्थन में, खून-पसीने की कमाई लूट कर खाते-खाते इतने बेहया हो गए हैं ये लोग की अब खून चूसने से भी परहेज़ नहीं रहा इन्हे। देश में हो रही हलचलों से इनके कानों पर एक जूँ तक ना रेंगे अगर इनका कोई खुद का राजनीतिक नफा-नुकसान न हो उसमे। लेकिन कोई कुछ नहीं बोलता और बोलता भी है तो बस बोलता ही है करता कुछ नहीं, क्योंकि हुवा कुछ नहीं।
आये दिन घोटाले हो रहे हैं जांच के नाम पर तमाम प्रकार के प्रपंच दुनिया को दिखाने के लिए सुविकसित कर लिए गए हैं और उन्ही में देश के लोगों को उलझाए रखा जाता है, कोई किसी मामले को लेकर समझे, किसी निष्कर्ष तक पहुंचे तब तक एक नया मामला सामने आ जाता है और पीछे क्या हुआ उसको "बीत गयी सो बात गयी” के तर्ज़ पर भूलते हुए सब उस नए मामले में हो हल्ला करने में जुट जाते हैं।
जो थोड़ा बहुत न्याय हो जाता है वो सिर्फ इस वजह से की न्यायपालिका को अपनी स्वायत्तता, अपना वजूद बरकरार रखने के लिए ऐसा करना अपरिहार्य हो जाता है, वर्ना लूटेरों की कमी तो वहाँ भी नहीं है | सब जानते हैं कि उस पवित्र पुस्तक पर हाथ रखने वाले 75% झूठ बोलते हैं लेकिन फिर भी प्रतिदिन नियम से उसका अपमान किया जाता है और 75 साल में किसी को कोई गुरेज भी नहीं हुआ या हुआ तो भी कुछ कर नहीं पाया इस सम्बन्ध में, क्योंकि हुआ कुछ नहीं |
समितियां बन रही हैं, बिगड़ रही हैं, कुछ रिपोर्ट देती हैं, कुछ की रिपोर्ट्स सड़ रही हैं, किसी दफ्तर के किसी कोने में जहाँ बड़े साहब पान खाकर थूकते हैं और घोटाले अब भी हो रहे हैं। जो कुछ लोग सही सलामत बच जाते हैं, किसी तरह दो वक़्त की रोटी में अपने आप को बहलाये फुसलाये रहते हैं कि किसी झगड़े-झंझट में ना पड़ें, जो खुद को शरीफों में गिनने की व्यर्थ कोशिश करते हैं, वो इन राजनीतिक दरिंदों के रचे साम्प्रदायिक दंगों की भेंट चढ़ जाते हैं, तो मैं समझता हूँ उन पर दुःख करना व्यर्थ है, वे उसी के लायक हैं क्योंकि उन ने भी अपनी उस माँ के साथ गद्दारी की है जिसकी गोंद में खेलकर वे बड़े हुवे, जिसका सीना चीरकर उगाया अन्न उन ने खाया-पचाया | वे भी उतने ही गुनेहगार हैं जितना बाकी के गुनेहार |
इसमें कोई संदेह नहीं है मुझे कि आज हमारी खुद की सरकार जिसे हम ये सोचते हैं कि हमने आजादी के बाद खुद से चुना है, जो जनता द्वारा जनता के लिए जनता का शासन यानि जनतंत्र है, वो भी तब की सरकार की तरह ही सब कुछ करने लग गयी गयी है | अब ये हमें तय करना है कि हमें इन लूटेरों से छुटकारा चाहिए, हमें तमाम उन ब्रिटिश नियमों से छुटकारा चाहिए जो देश को गुलामी में जकड़ने या जकड़े रखने के लिए बनाये गए थे या फिर इनके तलवे चाटते अपना जीवन बिता देना चाहिए।
मेरे विचार तो स्पष्ट हैं, आप भी अपने विचार स्पष्ट कर लें, उचित होगा, आपके लिए भी देश के लिए भी और सांस्कृतिक विरासत के लिए भी, जो शनैः-शनैः संस्कृति से सांस्कृतिक विरासत बनने की ओर अग्रसर है |
पूरा पढ़ने वालों को बहुत-बहुत धन्यवाद!