मैं देख रहा था सुबह को अचानक नींद में से उठ कर।
कल रात भर तुम्हारा आभास रहा मेरे सिरहाने। मेरे नेत्र खुले रहें। हिचकियाँ भी शुरू हो गईं। मुझे लगा तुम मुझे याद कर रही हो। असंभव—मैंने सोचा। तुम मुझे भूल नहीं सकती। मुझे विश्वास है।
भोर के किसी क्षण में मैं तुम्हारे आभास के आलिंगन में सो गया।सुबह जब नींद टूटी तब तुम्हारे आभास के आलिंगन के अभाव से टूटी। आभास था। सोफे के दूसरे सिरे पर बैठा था।
मैं उठा। दांत मांझे, नहाया, धुले कपड़े पहने। परंतु एक वो हताश चेहरा भी पहना। चेहरा मुस्कुरा रहा था। कटाक्षी या असल, इसका भेद नहीं किया जा सका मुझ से।
फिर घर में लड़ा। नीचे गया भाई के साथ काम पर जाने हेतु। भाई को उसके काम वाली जगह पर छोड़ा। मैं अपने काम पर नहीं गया।
मेरा मन व्याकुल था। तुम्हारा आभास नहीं आया था काम वाली जगह पर मेरे साथ। तुम्हारी झलकें आयी थीं। तुम से हू-ब-हू कुछ चेहरे भी दिखे। आभास नहीं था। आभास नहीं लिपटा था मेरे तन से।
मैंने तुम्हारी उपस्तिथि अपनी शर्ट की ऊपरी जेब में रखी। और मैं निकल पड़ा कोई वृक्ष ढूंढने। काफी वृक्ष दिखे पर कोई छोटा, कोई बुज़ुर्ग, कोई सूखा, कोई मृत्यु की कोख में पलता हुआ। फिर याद आया विजुभाई ने मणिनगर में स्थित एक पार्क बताया था। मैं वहां चला गया।
शाम होने को थी। वृक्षों की छांव में धूप की मात्रा बेहद कम थी। कारण शायद बारिश का मौसम था। पर घांस भी इतनी हरी थी के मुझे धरा का भूरापन और तुम्हारे होने का सफेदपन दोनों दिख रहा था पार्क में।
मैं घांस पर कुछ यूं बैठा जैसे बचपन में पिता की गोद में बैठा करता था। मैंने शर्ट की जेब से तुम्हारी उपस्तिथि निकाली और घांस पर रख दी। तुम मुझ से बतियाने लगी; पत्तियों और हवाओं के मिथुन द्वारा, एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर यात्रा करती उस चिड़िया द्वारा, दूर से आ रही मोर की आवाज़ द्वारा, ऊपर आकाश में बादलों पर तुम्हारे नाम और मेरे नाम का पहला अक्षर लिखते हुए तुम मुझ से बतिया रही हो।
शब्दों का अभाव है पर संवाद पूर्ण हैं।
कुछ देर बाद वापिस जाने हेतु जब मैं उठा तब मेरे जूतों के फीते खुल चुके थे। मैं बांधने हेतु नीचे झुका तो तुम्हारी आवाज़ मेरे कानों पर पड़ी। तुमने कहा;
"नूर, हम क्षणिक हैं किंतु हमारा प्रेम अमर है।"
मैं उठा। चल पड़ा। तुम्हारे आभास, तुम्हारी उपस्तिथि को उपरी जेब और एक असल मुस्कुराहट चहरे पर डाल कर।












