मैंने सोचा अब थोड़ा तुमसे ध्यान हटाकर ईश्वर पर केंद्रित करता हूं।
उनकी माला जपते जपते तुम्हारा नाम जपने से मैं इतना दूर था, जितनी भोर सूरज से।
मुझे पता है ईश्वर तो समझेंगे। वो साक्षात प्रेम हैं, दयालु हैं, कृपालुनिधान हैं।
पर ये गृह नक्षत्रों को बिल्कुल नहीं भाने वाला। मैं तैयार हूं संघर्षों के लिए। अब तुम जल्दी से आ जाओ, तो ये आधे हो जाएं।
अपने मन की मैं जानू, और पी के मन की राम।
सांसों की माला पे सिमरूं मैं पी का नाम...















