Kufic style of Arabic patterns - TOMB OF ILTUTMISH - Mehrauli, New Delhi, INDIA

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Kufic style of Arabic patterns - TOMB OF ILTUTMISH - Mehrauli, New Delhi, INDIA
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Why DIDN'T Chinggis Khan invade India?
In late 1221, Chinggis Khan defeated Khwarezm-shah Jalal al-Din Mingburnu on the borders of India: yet, India was spared the wrath of Chinggis Khan himself. Though Mongol armies would threaten the Delhi Sultanate later in the century, Chinggis Khan turned away from the subcontinent. Here, we look at the possible reasons Chinggis Khan did not invade India, as well as the impact his close presence did have, in the form of the fleeing Khwarezmian, Jalal al-Din.
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Learn more about Raziyya's rise to the throne of Delhi. She was the first woman ruler of India and the only woman who ever sat upon the throne of Delhi.
Raziyya, the eldest daughter of Sultan Shams al-Din Iltutmish (1211-1236), possessed all the qualifications necessary for kings. During the lifetime of her father, she used to administer affairs of the kingdom, and possessed great grandeur, on account that her mother Turkan Khatun, was the chief lady of the harem, and her place of residence was the royal palace, the Kushk-i-Firuz. During his Gwalior campaign, Iltutmish had left Raziyya in charge of Delhi and on his return, he was very much impressed by her abilities in managing the administration of the Sultanate.
इल्तुतमिश MCQ Notes: प्रमुख उपलब्धियां, प्रशासन और इक्ता प्रणाली / Iltutmish MCQ Notes: Key Achievements, Administration & Iqta System
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इल्तुतमिश को दिल्ली सल्तनत का स्थिरकर्ता माना जाता है, क्योंकि उसने संकटों से जूझ रही सल्तनत को न केवल सँभाला, बल्कि उसे संगठन, प्रशासन और सैन्य शक्ति के आधार पर मज़बूत रूप दिया। उसके शासनकाल को सल्तनत की प्रारंभिक संरचना को मजबूत करने का काल माना जाता है। दी गई छवि उसके राजनीतिक कार्यों, सैन्य नीतियों और प्रशासनिक क्षमता का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य प्रस्तुत करती है।
परिचय:
इल्तुतमिश को “गुलाम वंश का वास्तविक संस्थापक” क्यों कहा जाता है?
दास शासको में सबसे महान इल्तुतमिश था। इल्तुतमिश को सुल्तान आजम, नासिर-अमीर-उल-मोमिन, गुलामो का गुलाम, तथा मकबरों का पितामह कहा जाता है। इल्तुतमिश दिल्ली सल्तनत का पहला शासक था जिसने 'सुल्तान' की उपाधि धारण की थी और जिसने दिल्ली सल्तनत को वास्तविक रूप से संगठित राज्य बनाया। अभिलेखों में उसे 'ईश्वर की भूमि का संरक्षक' एवं 'ईश्वर के सेवकों का सहायक' कहा गया है। इल्तुतमिश का शाब्दिक अर्थ 'राज्य का रक्षक' होता है।
इल्तुतमिश का प्रारम्भिक जीवन और सत्ता ग्रहण
इल्तुतमिश का पूरा नाम शमसुद्दीन इल्तुतमिश था। इल्तुतमिश इल्बारी जनजाति का तुर्क था। इसके पिता इलाम खां थे। बचपन मे ही सौतेले भाईयो द्वारा धोके से बेच दिया गया। दो बार बिकने के बाद बसरा (इराक) के व्यापारी जलालुद्दीन मुहम्मद द्वारा खरीद लिया गया।ऐबक ने अन्हिलवाड़ विजय (1197 ई0) के बाद इल्तुतमिश को खरीदा था। सुल्तान बनाने से पहले वह बदायूँ का सूबेदार था। 1205-06 में खोखर जाति के विद्रोह को दबाने लिए किए गये अभियान में वह मुहम्मद गोरी और ऐबक के साथ था। युद्ध मे उसने साहस और कौशल का परिचय दिया, जिससे प्रभावित होकर गोरी ने ऐबक को उसकी दासता से मुक्त करने का आदेश दिया। क्योंकि वह कुतुबुद्दीन ऐबक का दास था, इसिलिये उसे "गुलामो का गुलाम" भी कहा जाता है। कुतुबुद्दीन ऐबक ने उसे दासता से मुक्त कर दिया और अपनी पुत्री का विवाह उसके साथ कर दिया। कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु के बाद इल्तुतमिश का चयन दिल्ली के तुर्क अमीरो (ऐबक के सिपहसालार अमीर अली इस्माइल) एवं सैन्य अधिकारियों ने किया था। यही इल्तुतमिश द्वारा सत्ता ग्रहण करने का आधार था। इल्तुतमिश ने 1211 ई0 में दिल्ली को राजधानी बनाया।
इल्तुतमिश का प्रशासन: दिल्ली को “हजरत-ए-दिल्ली” बनाना
इल्तुतमिश दासता से मुक्ति पा चुका था। उसने अपने नाम का खुतबा पढ़वाया उसने दिल्ली सल्तनत को न केवल अक्षुण्य रखा वरन उसे एक सुसंगठित राज्य बना दिया। उसने दिल्ली को राजनीतिक, प्रशासनिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों का केन्द्र बना दिया। यह उसके कार्यो का ही फल था कि दिल्ली को "हजरत-ए-दिल्ली" (प्रतिभाशाली दिल्ली) के रूप में जाना जाने लगा। दिल्ली को 'योगिनीपुर' एवं 'कुव्वत-उल-इस्लाम' भी कहा जाता है। बलबन के "पालम बाओली" अभिलेख में (13 वी सदी) में दिल्ली को किसी "उधारा" नामक व्यक्ति द्वारा निर्मित बताया गया है। बरनी के अनुसार, 'चंगेज खां से उत्पीड़ित होकर अनेक प्रसिद्ध राजकुमार, कुलीन, मंत्री एवं अन्य इल्तुतमिश के दरबार मे आये। उनकी उपस्थिति में उसके दरबार का वैभव और स्तर इतना बढ़ गया कि वे महमूद एवं सीजर के दरबारो के समान दिखाई देने लगे" दिल्ली सल्तनत में पहली बार वंशानुगत राजसत्ता स्थापित करने का प्रयास इल्तुतमिश ने ही किया था।
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खलीफा से मान्यता – दिल्ली सल्तनत का वैध जन्म
18 फरवरी 1229 ई0 में उसने सुल्तान के पद की स्वीकृति गोर के किसी शासक से नही अपितु बगदाद के अब्बासी खालिफ़ा अलमुस्तसिर से प्राप्त किया। रजीउद्दीन हसन सगानी को खलीफा ने अपना दूत बनाकर इल्तुतमिश के पास भेजा था। खलीफा ने इल्तुतमिश को 'नासिर-अमीर-उल-मोमिनीन' (मुसलमान का प्रधान या खलीफा का सहायक) की उपाधि प्रदान की थी। उसी ने सर्वप्रथम इस खलीफा के नाम से सिक्के चलवाये थे। खलीफा ने इल्तुतमिश के शासन की पुष्टि उस सारे क्षेत्र में कर दी, जो उसने विजित किया। खलीफा से मान्यता मिलने के बाद इल्तुतमिश ने 'सुल्तान-ए-आजम' (महान सुल्तान) की उपाधि धारण किया। और खलीफा ने उसे 'खिलअत' का प्रमाण-पत्र भी प्रदान किया। बरनी ने खलीफा के एक अन्य दूत काजी जलाल उरुस का विवरण दिया है। वह इल्तुतमिश के लिए 'सफीनत-उल-कुलफा' की एक प्रति लाया जिसमे मामून का हस्ताक्षरित लेख था। इस भेंट से इल्तुतमिश बहुत प्रसन्न हुआ था। खलीफा द्वारा मान्यता मिलने के बाद इल्तुतमिश वैध सुल्तान और दिल्ली सल्तनत स्वतंत्र राज्य बन गया। इन सब कारणों से इल्तुतमिश को दिल्ली सल्तनत का प्रथम वैधानिक सुल्तान माना जाता है।
इल्तुतमिश और सूफीवाद
इल्तुतमिश रात्रि में अपना अधिकतर समय प्रार्थना एवं चिंतन में व्यतीत करता था। इसामी के अनुसार इल्तुतमिश का कुछ समय बगदाद में व्यतीत हुआ था। यहाँ वह "अवारिफुल मआरिफ़" के लेखक शेख शहाबुद्दीन सुहरावर्दी तथा शेख औहदुद्दीन किरमानी जैसे सूफी संतों के सम्पर्क में आया। उसके युवा मस्तिष्क पर सूफीवाद का गहरा प्रभाव पड़ा। प्रारम्भिक सूफी साहित्य में भी उसकी सूफीवाद में रुचि स्पष्ट होती है। सूफी बाबा फरीद के विशिष्ट शिष्य हांसी के सूफी जमालुद्दीन ने इल्तुतमिश की मृत्यु पर दो मरसिया (शोक गीत) लिखा था। इल्तुतमिश, शेख नज़्मुद्दीन सुगरा उर्फ नक्शबी को पिता कहकर संबोधित करता था। सूफी हमीदुद्दीन नागौरी (शेख मुहम्मद इब्ने अता) ने एक बार इल्तुतमिश के दरबार मे उपस्थित होकर कहा था कि "हे बादशाह, बगदाद की खानखाह में हुई एक सभा मे सूफियों की सेवा के कारण ही तुझे हिंदुस्तान का साम्राज्य प्राप्त हुआ है।" इल्तुतमिश की धार्मिक वृत्ति को समंझने के लिए इतिहासकारो ने आबदीद (भीगी आंखे) शब्द का प्रयोग किया है।
मंगोल आक्रमण और इल्तुतमिश की नीति
सर्वप्रथम मंगोलो का आक्रमण इल्तुतमिश के समय मे हुआ। सन 1221 ई0 में मंगोल नेता चंगेज खां (तेमुचिन) भारत की उत्तर-पश्चिम सीमा पर इल्तुतमिश के शासनकाल में आया था। चंगेज खां स्वयं को खुदा का कहर कहता था। उसे स्वर्गपुत्र, समुद्री खान, का-खान, या का-आन, मंगोलिया का सबसे शक्तिशाली खान, महान, ईश्वर का दण्ड, बुजुर्ग खान (Grand Khan) एवं श्रापित भी कहा गया है। तेमुचिन का पिता एशुगई बहादुर मंगोलो की 'कियात शाखा' का मुखिया था। चंगेज खान के तीन पोत्रो (मोन्गकी, कुबलाई खान एवं हलाकू) को तीन महान खान कहा जाता है। जिनके समय मे मंगोल साम्राज्य का अत्यधिक विस्तार हुआ था। चंगेज खां ने ख़्वारिज्म शाह के ऊपर आक्रमण किया। ख़्वारिज्मशाह कैस्पियन सागर के तट की ओर भाग गया वही उसका पुत्र जलालुद्दीन मगबरनी सिन्धु नदी के तट तक पहुँच गया था (भारत)। उसने इल्तुतमिश के पास शरण मांगने हेतु अपने दूत आइनुलमुल्क को भेजा। संभवतः चंगेज खां ने भी इल्तुतमिश के पास अपने दूत भेजे थे कि वह मगबरनी की सहायता न करे, अतः इल्तुतमिश ने उसकी सहायता नही की। 1221 ई0 में चंगेज खां जलालुद्दीन मगबरनी का पीछा करते हुए सिन्धु नदी के तट पर आके रुक गया। भागते हुए जलालुद्दीन मगबरनी ने अपने घोड़े सहित पानी मे छलांग लगाई थी। उसी स्थान को “चोले जलाली” कहा जाता है। वापस लौटने से पूर्व चंगेज खां ने इल्तुतमिश के पास संदेश भेजा कि "मैंने हिंदुस्तान में अपनी सेना भेजने की नीति का परित्याग कर दिया है। गिलगित होते हुए चीन जा रहा हूँ, क्योंकि मुझे जलते हुए भेड़-चर्मो से शुभ संकेत प्राप्त नही हुए हैं।" इल्तुतमिश ने दिल्ली सल्तनत को मंगोल हमलों से सुरक्षित रखने के उद्देश्य से सिन्ध राज्य को मध्यवर्ती राज्य (Buffer State) के रूप में प्रयोग किया था।
मुद्रा सुधार—चाँदी का टंका और ताँबे का जीतल
इल्तुतमिश ने ही भारत मे सल्तनत काल मे सर्वप्रथम शुद्ध अरबी सिक्के चलाये थे। सल्तनत युग के दो महत्वपूर्ण सिक्के चाँदी का टंका (175 ग्रेन) और ताँबे का जीतल उसी ने आरम्भ किये (टंका : जीतल = 1:48 का अनुपात था। दक्षिणी भारत मे 1: 50 का अनुपात था।) तथा सिक्को पर टकसाल का नाम लिखने की परम्परा शुरू की। दिल्ली का पहला सुल्तान इल्तुतमिश ही था जिसने इक्ता प्रथा की शुरुआत की।
बंगाल और अन्य विजयों का विस्तार
ऐबक की मृत्यु के बाद बंगाल में अलिमर्दान ने स्वतंत्र सत्ता स्थापित कर ली थी। लेकिन हुसामुद्दीन एबाज खिलजी ने अलिमर्दान की हत्या कर सत्ता पर अधिकार कर गयासुद्दीन सुल्तान की उपाधि धारण कर ली। भारत का पहला क्षेत्रीय सामंत जिसने खलीफा से सुल्तान के पद की स्वीकृति प्राप्त की थी। 1226 ई0 में इल्तुतमिश के पुत्र तथा अवध के सूबेदार नासिरुद्दीन महमूद ने बंगाल के सूबेदार हुसामुद्दीन एबाज खिलजी जिसने गयासुद्दीन की उपाधि धारण की थी, को हराकर उसकी राजधानी लखनौती पर अधिकार कर लिया और बंगाल एवं बिहार का सूबेदार मलिक जानी को बनाया गया। लेकिन इल्तुतमिश के वापस आते ही हुसामुद्दीन ने फिर विद्रोह कर दिया। इस बार इल्तुतमिश ने अपने पुत्र नासिरुद्दीन को बंगाल भेजा, हुसामुद्दीन मारा गया। नसीरुद्दीन को बंगाल का सूबेदार बनाया गया। लेकिन 1229 ई0 में शहजादा नसीरुद्दीन की मंगोलो से लड़ते हुए मृत्यु हो गई। इस स्थिति का लाभ उठाते हुए मलिक इख़्तियारूद्दीन बल्का खिलजी ने विद्रोह करके सत्ता पर अधिकार कर लिया। इस बार स्वयं इल्तुतमिश ने जाकर विद्रोह को शांत किया और बल्का खिलजी मारा गया। 1230-31 ई0 में बंगाल को दिल्ली सल्तनत का अंग बना लिया गया। इल्तुतमिश गयासुद्दीन को सदैव सुल्तान कहकर सम्बोधित करता था। इल्तुतमिश के अनुसार "ऐसे शासक को सुल्तान कहने में कोई संकोच नही करना चाहिए जिसने ऐसे शुभ कार्य किये हो जैसे सुल्तान गयासुद्दीन ने किये।"
इल्तुतमिश की महत्वपूर्ण विजय
इल्तुतमिश द्वारा 1226 ई0 में रणथम्भौर पर विजय प्राप्त की। इसके पश्चात परमारो की राजधानी मंदौर पर अधिकार कर लिया गया। 1228 ई0 में जालौर के शासक उदयसिंह को आधिपत्य स्वीकार करने एवं वार्षिक कर देने के लिये वाध्य किया। 1231ई0 में ग्वालियर के शासक मंगलदेव पर आक्रमण करके विजय प्राप्त की। संभवतः इसी समय इल्तुतमिश ने अपनी पुत्री रजिया को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था।
न्याय व्यवस्था
इब्नबतूता के वर्णन से ज्ञात होता है कि इल्तुतमिश ने अपने महल के सामने संगमरमर की दो शेरो की मूर्तियां स्थापित करायी थी, जिनमे घंटियां लगी हुई थी। जिनको बजाकर कोई भी व्यक्ति सुल्तान से न्याय की मांग कर सकता था। इल्तुतमिश ने सभी शहरों में काजी और अमीरदाद नमक अधिकारी नियुक्त किये थे।
इल्तुतमिश की मृत्यु और ऐतिहासिक मूल्यांकन
1234-35 ई0 में मालवा पर आक्रमण किया और भिलसा एवं उज्जैन को जीतने में सफलता प्राप्त की। तुर्को ने भिलसा के प्राचीनतम हिन्दू मंदिर तथा उज्जैन के महाकाली के मन्दिर की लूटा और नष्ट कर दिया। परन्तु यह मालवा की विजय न थी केवल लूटमार थी। 1236 ई0 में इल्तुतमिश का अन्तिम अभियान बनियान( सिन्ध) के शासक सैफ़ुद्दीन हसन कार्लुग के विरुद्ध किया। इसी समय 1236 ई0 में इल्तुतमिश की मृत्यु हो गयी। इल्तुतमिश ने हिन्दू राजाओ के प्रति दृढ़ और आक्रमणकारी नीति अपनाई। मुख्यतः उसने तुर्की राज्यों से से छीने गये स्थानों को पुनः जीतने और अपने अधीन प्रदेशो में अपनी सत्ता को दृढ़ करने का प्रयत्न किया।
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इतिहासकारों के कथन
डॉ0 आर0 पी0 त्रिपाठी के अनुसार, "भारत मे मुस्लिम संप्रभुता का इतिहास इल्तुतमिश से आरम्भ होता है।" सर वूल्जले हेग के अनुसार,"इल्तुतमिश गुलाम शासको में सबसे महान था।" डॉ0 ईश्वरी प्रसाद के अनुसार,"इल्तुतमिश, निःसंदेह गुलाम वंश का वास्तविक संस्थापक था।" प्रोफेसर खलिक अहमद निजामी के अनुसार, इल्तुतमिश ने दिल्ली सल्तनत को एक व्यक्तित्व, एक पद, एक प्रेरणा शक्ति, एक दिशा, एक शासन व्यवस्था और एक शासक वर्ग प्रदान किया। ए0 बी0 एम0 हबीबुल्ला के अनुसार, ऐबक ने दिल्ली सल्तनत की सीमाओं और उसकी सम्प्रभुता की रूपरेखा बनाई, निःसंदेह ही इल्तुतमिश उसका पहला सुल्तान था।
FAQs — इल्तुतमिश MCQ Notes: प्रमुख उपलब्धियां, प्रशासन और इक्ता प्रणाली Q1. इल्तुतमिश को दिल्ली सल्तनत का वास्तविक संस्थापक क्यों कहा जाता है?
उत्तर: इल्तुतमिश को वास्तविक संस्थापक इसलिए माना जाता है क्योंकि उसके शासन में दिल्ली सल्तनत पहली बार मजबूत और संगठित रूप में उभरी। उसने न केवल राजनीतिक अस्थिरता को खत्म किया बल्कि प्रशासन, मुद्रा व्यवस्था, प्रांतों के संगठन तथा इक्ता प्रणाली को सुव्यवस्थित कर एक केंद्रीकृत शासन की नींव रखी।
Q2. इल्तुतमिश की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि क्या मानी जाती है?
उत्तर: उसकी प्रमुख उपलब्धि इक्ता प्रथा को व्यवस्थित और नियंत्रित रूप देना माना जाता है। साथ ही उसने बंगाल, मलवा, रणथंभौर और अजमेर को सल्तनत में शामिल कर क्षेत्रीय विस्तार किया और राजपूत विद्रोहों को शांत कर स्थिरता स्थापित की।
Q3. इल्तुतमिश के प्रमुख प्रशासनिक सुधार कौन-कौन से थे?
उत्तर: उसने प्रशासन को प्रभावी बनाने के लिए कई सुधार किए, जिनमें—
- प्रांतों का इक्ताओं के रूप में पुनर्गठन - इक्तादारों पर केंद्र का कठोर नियंत्रण - टका और जिटल जैसी नई मुद्राओं का प्रचलन - न्याय एवं सैन्य प्रशासन में सुधार - तुर्क अमीरों के प्रभावी दल ‘चालीसा’ का गठन
इन उपायों से सल्तनत की प्रशासनिक क्षमता काफी बढ़ी।
Q4. इल्तुतमिश की इक्ता प्रणाली में इक्तादारों की क्या भूमिका थी?
उत्तर: इक्तादार अपने क्षेत्र से राजस्व एकत्र करते थे, स्थानीय शांति-व्यवस्था संभालते थे और आवश्यकता पड़ने पर सुल्तान को सैनिक प्रदान करते थे। वे भूमि के मालिक नहीं होते थे और उनका पद वंशानुगत भी नहीं था। स्थानांतरण उनके नियंत्रण को सीमित रखता था और केंद्र की शक्ति को मजबूत करता था।
Q5.
इल्तुतमिश का इतिहास ( 1211-1236 ई. ) - दिल्ली सल्तनत
इल्तुतमिश का इतिहास ( 1211-1236 ई. ) – दिल्ली सल्तनत
इल्तुतमिश का इतिहास – History of Iltutmish भारत पर मुस्लिम आक्रमण – Muslim Invasion Of India इल्तुतमिश का इतिहास कुतुबुद्दीन ऐबक की मृत्यु के पश्चात् दिल्ली सल्तनत की बागडोर उसके गुलाम व दामाद इल्तुतमिश के हाथों में आई, जोकि दिल्ली का पहला सुल्तान था, जिसे सुल्तान के पद की स्वीकृति किसी गौर के शासक से नहीं बल्कि बगदाद के खलीफा से प्राप्त हुई थी। इस तरह वह कानूनी रूप से दिल्ली का प्रथम सुल्तान…
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The Slave Dynasty: 1206-1290 AD
The Slave Dynasty: 1206-1290 AD
The empire which ruled North India from AD 1206 to AD 1526 was known as the Delhi Sultanate because Delhi was their capital (the seat of their empire) and the kings were known as Sultans. Five successive dynasties ruled Delhi. These were the Slave Dynasty, Khilji Dynasty, Tughlaq Dynasty, Sayyid Dynasty and Lodi Dynasty. The Slave Dynasty (1206-1290 AD) Qutb-ud-din Aibak (1206-1210) After…
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Sultan Shams-uddin- Iltutmish was the third and greatest sultan of the Mamluk Sultanate which was part of Delhi Sultanate. Iltutmish was born in a Turkish family in Central Asia. He was sold as a slave and later bought by Qutubuddin Aibak(Sultan of Mamluk Sultanate). He grew in rank showing his skill and rose to the position of governor of Badaun under Qutubuddin Aibak who also married his daughter to Iltutmish. After Aibak's death his son Aram Shah ruled for a brief few months after which Iltutmish became the Sultan of Mamluk Sultanate in 1211 AD. Iltutmish was a wise ruler and strengthened his sultanate by leading successful campaigns.Iltutmish moved the capital of his sultanate to Delhi where he built the famous Qutub Minar. Iltutmish has been called as the greatest of Mamluk Sultan(of Delhi Sultanate). In 1221, the conqueror Genghis Khan's mongolian army stopped at the Punjab river and did not wish to cross or attack the fleeing defeated Shah, Jalal uddin Mangbarni of the Khwarizm empire who had entered the boundaries of Iltutmish's Delhi Sultanate and Genghis Khan's crossing or attack would have be considered an attack on Iltutmish's Delhi Sultanate which the Mongolians avoided. In 1229 A.D. the Khalifa of Baghdad , Al Mustansir Billah bestowed the titles of "Nasir-amir-al-Mommin" (Deputy of the leader of faithful) and "Sultan-i-Azam". Iltutmish was the first Sultan of Delhi, who received the investiture of the Khalifa. Iltutmish was the student and disciple of the eminent Qutubuddin Bakhtiyar Kaki , who was the leader of Chishti spiritual order of Islamic Sufism responsible for winning the hearts of the people of Indian Subcontinent. Iltutmish's reign over Delhi Sultanate lasted from 1211 - 1236 A.D. Iltutmish died from Illness in 1236. He was the father of Razia. Iltutmish was buried in Qutab Complex Delhi. #iltutmish #delhisultanate #mamluksultanate #qutubminar #shamsuddiniltutmish #history #historia https://www.instagram.com/p/CCh4H8DDb9e/?igshid=1tqap4xz7haae