खामोशी।
महर है तमस की,
मैं निर्धारित नियति से अनजान हूं।
नहर है विफलता की
मैं तैराकी सक्षम व बलवान हूं।
कह ना सकता जो भीत मेरे
तुझे भय होगा मुझसे।
रह ना पाता धीरज की छाया में
सबर की शकल नही देखी गई मुझसे।
चारों ओर शोर है,मैं बेहरा हूं
दूषित हूं एक नदी फिर भी बहरा हूं
सूचित नही अपनी आत्मा से,मैं बदतमीज
सुनिश्चित प्रकार से लुप्तता में रह रहा हूं।
अरे बिगुल बजाओ,समर का आरंभ करो,
मुझे समझाओ बैठ कर,यह निरर्थता का अंत करो,
सुर्ख क्यों है नभ,उत्तर दो मुझे,
माफी मेरी जुबान नही वो,मुझसे खामोशी से संवाद करो।
ज्ञान कराओ मुझे स्वयं का
"यदि" और "कदाचित" जैसे शब्दों से निर्माण करो मेरा
मैं खो जाऊंगा फिर खोह में,तुम मुझे खोज लेना,
प्रलय से रहता हर पल समीप,
एक कार्य कर सकते हो? विध्वंश को नाम दो तुम मेरा......
nikamma












