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जागो हिन्दुस्तानी हिन्दू धर्म को मिटाने का खुला षड्यंत्र सूझबूझ के धनी पं. श्रीराम शर्मा आचार्य, संस्थापक, अखिल विश्व गायत्री परिवारने बताया की ‘‘भारत में ईसाइ पादरियों का धर्म-प्रचार हिन्दू धर्म क...
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८ सितम्बर : अजा एकादशी
युधिष्ठिर ने पूछा : जनार्दन ! अब मैं यह सुनना चाहता हूँ कि भाद्रपद (गुजरात महाराष्ट्र के अनुसार श्रावण) मास के कृष्णपक्ष में कौन सी एकादशी होती है ? कृपया बताइये ।
भगवान श्रीकृष्ण बोले : राजन् ! एकचित्त होकर सुनो । भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की एकादशी का नाम ‘अजा’ है । वह सब पापों का नाश करनेवाली बतायी गयी है । भगवान ह्रषीकेश का पूजन करके जो इसका व्रत करता है उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं ।
पूर्वकाल में हरिश्चन्द्र नामक एक विख्यात चक्रवर्ती राजा हो गये हैं, जो समस्त भूमण्डल के स्वामी और सत्यप्रतिज्ञ थे । एक समय किसी कर्म का फलभोग प्राप्त होने पर उन्हें राज्य से भ्रष्ट होना पड़ा । राजा ने अपनी पत्नी और पुत्र को बेच दिया । फिर अपने को भी बेच दिया । पुण्यात्मा होते हुए भी उन्हें चाण्डाल की दासता करनी पड़ी । वे मुर्दों का कफन लिया करते थे । इतने पर भी नृपश्रेष्ठ हरिश्चन्द्र सत्य से विचलित नहीं हुए ।
इस प्रकार चाण्डाल की दासता करते हुए उनके अनेक वर्ष व्यतीत हो गये । इससे राजा को बड़ी चिन्ता हुई । वे अत्यन्त दु:खी होकर सोचने लगे: ‘क्या करुँ ? कहाँ जाऊँ? कैसे मेरा उद्धार होगा?’ इस प्रकार चिन्ता करते करते वे शोक के समुद्र में डूब गये ।
राजा को शोकातुर जानकर महर्षि गौतम उनके पास आये । श्रेष्ठ ब्राह्मण को अपने पास आया हुआ देखकर नृपश्रेष्ठ ने उनके चरणों में प्रणाम किया और दोनों हाथ जोड़ गौतम के सामने खड़े होकर अपना सारा दु:खमय समाचार कह सुनाया ।
राजा की बात सुनकर महर्षि गौतम ने कहा :‘राजन् ! भादों के कृष्णपक्ष में अत्यन्त कल्याणमयी ‘अजा’ नाम की एकादशी आ रही है, जो पुण्य प्रदान करनेवाली है । इसका व्रत करो । इससे पाप का अन्त होगा । तुम्हारे भाग्य से आज के सातवें दिन एकादशी है । उस दिन उपवास करके रात में जागरण करना ।’ ऐसा कहकर महर्षि गौतम अन्तर्धान हो गये ।
मुनि की बात सुनकर राजा हरिश्चन्द्र ने उस उत्तम व्रत का अनुष्ठान किया । उस व्रत के प्रभाव से राजा सारे दु:खों से पार हो गये । उन्हें पत्नी पुन: प्राप्त हुई और पुत्र का जीवन मिल गया । आकाश में दुन्दुभियाँ बज उठीं । देवलोक से फूलों की वर्षा होने लगी ।
एकादशी के प्रभाव से राजा ने निष्कण्टक राज्य प्राप्त किया और अन्त में वे पुरजन तथा परिजनों के साथ स्वर्गलोक को प्राप्त हो गये ।
राजा युधिष्ठिर ! जो मनुष्य ऐसा व्रत करते हैं, वे सब पापों से मुक्त हो स्वर्गलोक में जाते हैं । इसके पढ़ने और सुनने से अश्वमेघ यज्ञ का फल मिलता है ।
https://www.youtube.com/watch?v=GR2yMY3u8_U
८ सितम्बर : अजा एकादशी
युधिष्ठिर ने पूछा : जनार्दन ! अब मैं यह सुनना चाहता हूँ कि भाद्रपद (गुजरात महाराष्ट्र के अनुसार श्रावण) मास के कृष्णपक्ष में कौन सी एकादशी होती है ? कृपया बताइये ।
भगवान श्रीकृष्ण बोले : राजन् ! एकचित्त होकर सुनो । भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की एकादशी का नाम ‘अजा’ है । वह सब पापों का नाश करनेवाली बतायी गयी है । भगवान ह्रषीकेश का पूजन करके जो इसका व्रत करता है उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं ।
पूर्वकाल में हरिश्चन्द्र नामक एक विख्यात चक्रवर्ती राजा हो गये हैं, जो समस्त भूमण्डल के स्वामी और सत्यप्रतिज्ञ थे । एक समय किसी कर्म का फलभोग प्राप्त होने पर उन्हें राज्य से भ्रष्ट होना पड़ा । राजा ने अपनी पत्नी और पुत्र को बेच दिया । फिर अपने को भी बेच दिया । पुण्यात्मा होते हुए भी उन्हें चाण्डाल की दासता करनी पड़ी । वे मुर्दों का कफन लिया करते थे । इतने पर भी नृपश्रेष्ठ हरिश्चन्द्र सत्य से विचलित नहीं हुए ।
इस प्रकार चाण्डाल की दासता करते हुए उनके अनेक वर्ष व्यतीत हो गये । इससे राजा को बड़ी चिन्ता हुई । वे अत्यन्त दु:खी होकर सोचने लगे: ‘क्या करुँ ? कहाँ जाऊँ? कैसे मेरा उद्धार होगा?’ इस प्रकार चिन्ता करते करते वे शोक के समुद्र में डूब गये ।
राजा को शोकातुर जानकर महर्षि गौतम उनके पास आये । श्रेष्ठ ब्राह्मण को अपने पास आया हुआ देखकर नृपश्रेष्ठ ने उनके चरणों में प्रणाम किया और दोनों हाथ जोड़ गौतम के सामने खड़े होकर अपना सारा दु:खमय समाचार कह सुनाया ।
राजा की बात सुनकर महर्षि गौतम ने कहा :‘राजन् ! भादों के कृष्णपक्ष में अत्यन्त कल्याणमयी ‘अजा’ नाम की एकादशी आ रही है, जो पुण्य प्रदान करनेवाली है । इसका व्रत करो । इससे पाप का अन्त होगा । तुम्हारे भाग्य से आज के सातवें दिन एकादशी है । उस दिन उपवास करके रात में जागरण करना ।’ ऐसा कहकर महर्षि गौतम अन्तर्धान हो गये ।
मुनि की बात सुनकर राजा हरिश्चन्द्र ने उस उत्तम व्रत का अनुष्ठान किया । उस व्रत के प्रभाव से राजा सारे दु:खों से पार हो गये । उन्हें पत्नी पुन: प्राप्त हुई और पुत्र का जीवन मिल गया । आकाश में दुन्दुभियाँ बज उठीं । देवलोक से फूलों की वर्षा होने लगी ।
एकादशी के प्रभाव से राजा ने निष्कण्टक राज्य प्राप्त किया और अन्त में वे पुरजन तथा परिजनों के साथ स्वर्गलोक को प्राप्त हो गये ।
राजा युधिष्ठिर ! जो मनुष्य ऐसा व्रत करते हैं, वे सब पापों से मुक्त हो स्वर्गलोक में जाते हैं । इसके पढ़ने और सुनने से अश्वमेघ यज्ञ का फल मिलता है ।
https://www.youtube.com/watch?v=GR2yMY3u8_U
श्री कृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक शुभकामनाये .....
जीवन में बजे श्रीकृष्ण की बंसी (जन्माष्टमी : ५ सितम्बर) - पूज्य संत श्री आशारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन से ‘जन्माष्टमी तुम्हारा आत्मिक सुख जगाने का, तुम्हारा आध्यात्मिक बल जगाने का पर्व है, जीव को श्रीकृष्ण-तत्त्व में सराबोर करने का त्यौहार है, तुम्हारा सुषुप्त प्रेम जगाने की दिव्य रात्रि है । हे कृष्ण ! कुछ लोगों का मानना है कि सच्चे व्यक्तियों की कीर्ति, शौर्य और हिम्मत बढाने व मार्गदर्शन देने के लिए आप अवतरित हुए । कुछ मानते हैं कि जैसे मलयाचल में चंदन के वृक्ष अपनी सुगंध फैलाते हैं, वैसे ही अपने सोलह कला सम्पन्न अवतार से आप यदुवंश की शोभा और आभा बढाने के लिए अवतरित हुए । कुछ लोग यों कहते हैं कि वसुदेव और देवकी की तपस्या से प्रसन्न होकर देवद्रोही दानवों के जुल्म दूर करने, भक्तों की भावना को तृप्त करने के लिए वसुदेवजी के यहाँ निर्गुण-निराकार ईश्वर सगुण-साकार होकर अवतरित हुए । लीला और लटकों के भूखे ग्वाल-गोपियों को प्रसन्न करने, आनंद का दान करने के लिए आप अवतरित हुए । कुछ लोग यों भी कहते हैं कि जैसे नाव सागर में अधिक वजन लेकर चलने से डूब जाती है, ऐसे ही पृथ्वी जब पापियों के भार से डूबी जा रही थी, तब पृथ्वी ने पापियों के पाप-प्रभाव से दुःखी हो ब्रह्माजी की शरण ली और ब्रह्माजी ने आपकी शरण ली । तब हे अनादि, अच्युत ! हे अनंत कलाओं के भंडार !! पृथ्वी का भार उतारने के लिए आप सोलह कलाओं सहित पृथ्वी पर प्रकट हुए । शिशुपाल, कंस, शकुनि, दुर्योधन जैसे दुर्जनों की समाजशोषक वृत्तियों को ठीक करने के लिए, उनको अपने कर्मों का फल चखाने के लिए और भक्तों को सच्चाई व स्नेह का फल देने के लिए हे अच्युत ! हे अनादि !! आप साकार अवतार लेकर प्रकट हुए । कुंताजी कहती हैं : ‘‘हे भगवान ! वासना के वेग से बारम्बार जन्म, मृत्यु के चक्कर से संसार के कुचक्र मेंं बह जानेवाले जीवों को निर्वासनिक तत्त्व का प्रसाद दिलाने के लिए, लीला-माधुर्य, रूप-माधुर्य और उपदेश-माधुर्य से जीव का अपना निजस्वरूप जो कि परम मधुर है, सुखस्वरूप है उसका ज्ञान कराने के लिए, आत्मप्रसाद देकर जीवों को तारने के लिए आपका अवतार हुआ है । जीव के चौरासी लाख जन्मों के जो संस्कार हैं, उन्हीं संस्कारों को लेकर वह मनुष्य-शरीर में आता है । अतः वह स्वाभाविक ही विषय-विकारों एवं इन्द्रियों के भोगों में भटकता है । खाना-पीना, सोना, भयभीत होना, बच्चों को जन्म देना, दुःख आये तो घबराना, सुख आये तो हर्षित होना और आखिर में मर जाना - ये पुराने काम करते-करते जीव मनुष्य-शरीर में आया है । मनुष्य-शरीर में भी यही काम करते-करते वह खत्म न हो जाय इसीलिए भगवान का अवतार होता है । अवतार किसको कहते हैं ? अवतरति इति अवतारः । जो ऊपर से नीचे आये उसे अवतार कहते हैं । एक होता है ‘आरोहण दूसरा होता है ‘अवतरण । आरोहण माने नीचे से ऊपर उठना । शिशु कक्षावाला प्राथमिक में गया, फिर माध्यमिक में गया, महाविद्यालय में गया, पीएच.डी. हुआ अथवा चपरासी में से बाबू बन गया तो यह हुआ आरोहण पर कोई उद्योगपति अपने कारखाने में जाय, मैनेजर तथा अन्य मजदूर लोगों के साथ मिलकर हँसते-खेलते काम करे तो उस उद्योगपति का अवतरण हो गया अथवा कोई राजाधिराज-महाराज प्रजा के हित के लिए, अपने कार्यालयों में नौकर-चाकरों के साथ कार्यशैली बताने के लिए बैठे रहें तो यह उनका अवतरण हो गया । ऐसे ही संसार में भटकनेवाला जीव उपवास-व्रत रखता है, नियम करता है, धीरे-धीरे अपने आत्मा-परमात्मा के सुख को पाने के योग्य बनता है - यह है आरोहण और भगवान का होता है अवतरण । सामान्य आदमी कार्यालय में, दुकान में या राजा राज्य में जाता है तो अपने स्वार्थ से जाता है परंतु भगवान जब धरती पर अवतार लेते हैं तो उनका स्वार्थ नहीं होता, वे कृपावश, सुहृदयतावश अवतार लेते हैं । हेतु रहित जग जुग उपकारी । तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी ।। (रामचरित., उ.कां. : ४६.३) भक्त, सज्जन, साधु पुरुषों का उद्धार करने के लिए तथा दुष्कृत करनेवालों का विनाश करने के लिए अवतार होता है । ‘गीता (४.८) में आता है : परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । जो साधु स्वभाव के हैं, जिनके लिए संसार असार है और भगवान ही सार हैं; जो सच्चाई से, प्रसन्नता से, पवित्रता से, परहित की भावना से जीते हैं, ऐसे साधुजनों के पोषण के लिए और जो शोषण करते हैं, अति स्वार्थी हैं, अति कामी हैं, अति क्रोधी हैं, अति मोही, लोभी, लालची हैं, ऐसे लोगों का विनाश करके उनका कल्याण करने के लिए जो अवतरण है उसे अवतार कहते हैं । दुर्जनों के विनाश में भी उनका हित है, परम कल्याण है क्योंकि उनको भगवद्धाम की प्राप्ति हो जाती है और विनाश होने से वे पापकर्म करने से, शोषण करने से रुक जाते हैं, अधिक भोग-वासना से बच जाते हैं । समाज में जब शोषक लोग बढ गये, दीन-दुःखियों को सतानेवाले तथा चाणूर और मुष्टिक जैसे पहलवानों व दुर्जनों का पोषण करनेवाले क्रूर राजा बढ गये, समाज ‘त्राहिमाम्‘ पुकार उठा, सर्वत्र भय व आशंका का घोर अंधकार छा गया, तब भाद्रपद मास में कृष्णपक्ष की अंधकारमयी अष्टमी को कृष्णावतार हुआ । जिस दिन वे निर्गुण, निराकार, अच्युत, माया को वश करनेवाले, जीवमात्र के परम सुहृद प्रकट हुए, वह पावन दिन ‘जन्माष्टमी कहलाता है । उसकी आप सबको बधाई हो । आवश्यक नहीं है कि आप भगवान श्रीकृष्ण का अवतार रात्रि के बारह बजे ही मनाओ । श्रीकृष्ण का अवतार-उत्सव तो आप जब चाहो तब मना सकते हो । श्रीकृष्ण का अवतार-उत्सव मनाने से अभिप्राय है श्रीकृष्ण का आदर्श, श्रीकृष्ण का संकेत जीवन में लाना । हमने ‘कृष्ण-कन्हैया लाल की जय कह दिया, मक्खन-मिश्री बाँट दिया - खा लिया, इतने से ही अवतार-उत्सव मनाने की पूर्णाहुति नहीं होती । श्रीकृष्ण जैसी मधुरता को और चित्त की समता को जीवन में तमाम परेशानियों के बीच रहकर भी बनाये रखने का हमारा प्रयत्न होना चाहिए । यह जन्माष्टमी अपने प्रेम को प्रकट करने का संदेश देती है । जितना अधिक हम आत्मनिष्ठा में आगे बढते हैं, उतना-उतना हम श्रीकृष्ण का आदर करते हैं और श्रीकृष्ण का अवतार मनाते हैं । जन्माष्टमी पर हम संकल्प करें कि ‘गीता के संदेश को, योग के संदेश को, आत्मज्ञान के अमृत को हम भी पीयें और जगत में भी इस जगद्गुरु का प्रसाद बाँटें । वन्दे कृष्णं जगद्गुरुम् । श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव तब पूर्ण माना जायेगा जब हम उनके सिद्धांतों को समझेंगे तथा उन्हें अपने जीवन में उतारने की कोशिश करेंगे । जैसे गोकुल में कंस का राज्य नहीं हो सकता, ऐसे ही तुम्हारी इन्द्रियों के गाँव अर्थात् शरीर में भी कंस का अर्थात् अहंकार का राज्य न रहे अपितु श्रीकृष्ण की बंसी बजे, यही जन्माष्टमी का हेतु है । (ऋषि प्रसाद : अगस्त २००६)
५ सितम्बर : जन्माष्टमी, उपवास (निशीथकाल : रात्रि १२-१४ से १-०१ तक) https://www.youtube.com/watch?v=tuqYN_MdZ6k
१ सितम्बर : मंगलवारी चतुर्थी (दोपहर १-२४ से २ सितम्बर सूर्योदय तक)
(यह सूर्यग्रहण के बराबर पुण्यदायी है । इसमें किया गया स्नान, दान व श्राद्ध अक्षय होता है ।)
इस महापुण्यशाली दिवस पर सभी साधक भाई-बहन पूज्य बापूजी के स्वास्थ्य एवं शीघ्र रिहाई के लिए अधिक से अधिक जप-ध्यान व प्रार्थना करें
https://www.youtube.com/watch?v=c2dUiLsvetI
#BlackDay_31अगस्त क्या आप जानते हैं, कि जिन महापुरुष ( संत श्री आशारामजी बापू ) पर आजतक कोई आरोप सिद्ध नहीं हुआ, जानिए, आखिर कौन हैं " संत श्री आशारामजी बापू " 1). लाखों धर्मांतरित ईसाईयों को पुनः हिंदू बनाने वाले संत " पूज्य आशारामजी बापू हैं "
2).कत्लखाने में जाती हुई हमारी पूज्यनीय गौमताओं को बचाकर, उनके लिए सैकड़ों गौशालाएं खोलनेवाले संत " पूज्य आशारामजी बापू हैं "
3). ईसाई मिशनरिओं को खुली चुनौती देनेवाले संत " पूज्य आशारामजी बापू हैं "
4). शिकागो विश्व धर्मपरिषद में स्वामी विवेकानंदजी के 100 साल बाद जाके देश का नेतृत्व करते हुए भारत देश और हिन्दूत्व का परचम लहराने वाले संत " पूज्य आशारामजी बापू हैं "
5). विदेशी कंपनियों द्वारा देश को बचाकर आयुर्वेद का अनुसरण करने और सिखाने वाले संत " पूज्य आशारामजी बापू हैं "
6). "ऋषि प्रसाद" भारत की सबसे ज्यादा बिकनेवाली मासिक पत्रिका, जिसमे सनातन धर्म का ज्ञान समाया है, ऐसी पावन पत्रिका को छपवाने वाले संत " पूज्य आशारामजी बापू हैं "
7). लाखों करोड़ों विद्यार्थियों को सारस्वत मंत्र की दीक्षा देकर, उन्हें तेजस्वी बनाने वाले संत " पूज्य आशारामजी बापू हैं "
8). लाखों करोड़ों लोगों को अधर्म से धर्म की ओर ले जाने वाले संत " पूज्य आशारामजी बापू हैं "
9). 100 से ज्यादा देशों मे आश्रमों को स्थापित कर हिंदुत्व का विस्तार करने वाले संत " पूज्य आशारामजी बापू हैं "
10). वेलेंटाइन डे का विरोध करके "मातृ-पितृ पूजन दिवस" का प्रारम्भ करने वाले संत " पूज्य आशारामजी बापू हैं "
11). क्रिसमस डे के दिन क्रिसमस ट्री के बजाय, तुलसी पूजन दिवस मनाने का संदेश देनेवाले संत " पूज्य आशारामजी बापू हैं "
12). पाकिस्तान, चाईना, अमेरिका और बहुत सारे देशों में जाकर सनातन हिंदू धर्म का ध्वज फहरानेवाले संत " पूज्य आशारामजी बापू हैं "
13). बिकाऊ मीडिया को रुपयों के पैकेज ना देकर, गरीबों में भंडारा करने वाले संत " पूज्य आशारामजी बापू हैं "
14). गरीब इलाकों में चलचिकित्सालय चलवाकर निःशुल्क दवाईयाँ उपलब्ध करवाने वाले संत " पूज्य आशारामजी बापू हैं "
15). लाखों लोगों को बुरे व्यसनों से मुक्त कराने वाले संत " पूज्य आशारामजी बापू हैं "
16). युवाओं का सच्चा विकास करने हेतु, युवा सेवा संघ खोलकर उन्हें संयमी, साहसी व उद्धयमी बनाने वाले संत " पूज्य आशारामजी बापू हैं "
17). महिलाओं का सर्वांगीण विकास करने के लिए, महिला उत्थान मंडल खोलने वाले संत " पूज्य आशारामजी बापू हैं "
18). वैदिक शिक्षा पर आधारित अनेकों गुरुकुल खोलने वाले संत " पूज्य आशारामजी बापू हैं "
19). अपने सत्संगों में, सनातन हिंदू धर्म की महिमा बताने वाले संत " पूज्य आशारामजी बापू हैं "
20). पिछले 50 वर्षों से लगातार आदिवासीयों के बीच मुफ्त में भंडारा करनेवाले मुफ्त में मकान, कपड़े, अनाज व दक्षिणा बाटनें वाले संत " पूज्य आशारामजी बापू हैं "
21). मुश्किल हालातों में कांची कामकोठी पीठ के "शंकराचार्य श्री जयेंद्र सरस्वतीजी" का साथ देने वाले संत " पूज्य आशारामजी बापू हैं "
22). मुश्किल हालातों में स्वामी रामदेवजी, मोरारी बापूजी एवं अन्य संतों का साथ देने वाले संत " पूज्य आशारामजी बापू हैं "
23). मुश्किल हालातों में *निर्दोष* "साध्वी प्रज्ञासिंघजी ठाकुर" को जेल में मिलने जाकर, उन्हें सांत्वना देने वाले संत " पूज्य आशारामजी बापू हैं "
24). मुश्किल हालातों में, पूरे देश में चल रहे नकारात्मक प्रचार के समय भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, का साथ देने वाले संत " पूज्य आशारामजी बापू हैं "
25). "पूज्य आशारामजी बापू" जिनके सत्संग सुनने के लिये लाखों की भीड़ उमड़ती है, वे संत एक अंतरराष्ट्रीय षडयंत्र के शिकार हुए हैं,
जिसमें मुख्य रूप से ईसाई मिशनरियों द्वारा संचालित भारतीय बिकाऊ मीडिया भी शामिल है !
26). बिकाऊ मीडिया द्वारा दिन रात गलत खबरें दिखाकर बदनाम करने के बावजूद, जेल मे रहकर, जेल को भी स्वर्ग बनाने वाले संत " पूज्य आशारामजी बापू हैं "
27). "पूज्य आशारामजी बापू" के विश्व में 6 करोड़ से अधिक शिष्य हैं और इतने घोर कुप्रचार में भी वो अबतक अपने सतगुरुदेव के प्रति श्रद्धाभाव से टिके हैं !
28). हम आपसे ही पूछते हैं ! सच्चे दिलसे ज़रा सोचकर देखिये, कि 75वर्ष के वृद्ध महान ब्रह्मज्ञानी संत, क्या गलत कार्य कर सकते हैं.. ??
29). जिनके श्रीचरणों में लाखों करोड़ों लोग शीश झुकाते हैं और जो हर समय साधकों से घिरे रहते हैं !
30). क्या वे 2000km दूर से किसी भी कन्या को उसके माता पिता के साथ बुलाकर, उसके साथ गलत कर सकते हैं.. ??
31). क्या 50 वर्षों से लगातार समाज सेवाएँ और ब्रह्मज्ञान का सत्संग करने वाले 75वर्षीय वृद्ध संत ऐसा कर सकते हैं.. ??
स्वयं विचारें
32). यह पोस्ट इस हिंदुस्तान के निष्क्रिय सज्जनों को दिखाने हेतु बनाया गया है ! जो अपने हिंदुस्तान के महापुरुषों के साथ अन्याय होता देखकर भी, चुप हैं
33). संत श्री आशारामजी बापू निर्दोष हैं और पूज्य बापूजी को एक सुनियोजित षड्यंत्र के चलते फसाया गया है !
अधिक जानकारी के लिए निकट के संत श्री आशारामजी आश्रम में संपर्क करें ( हरी ॐ )
34). अगर आप एक सच्चे हिन्दुस्तानी हैं और आपको इस बात पर गर्व है, तो अब अपनी सक्रियता दिखाएँ
... और पेट की बीमारियाँ छू ! प्रतिदिन प्रात: सूर्योदय के कुछ समय पश्चात सूर्य की किरणें नाभि पर पड़ें इस ढंग से वज्रासन में बैठें । श्वास बाहर छोडकर बहिर्कुम्भक* करें । फिर ‘रं’ का २५ बार जप करते हुए पेट अंदर –बाहर करें । इससे मन्दाग्नि, एसिडिटी, गैस – सभी पर जादुई असर पडेगा । (ऋषि प्रसाद. जुलाई २००४,अंक १३९.पेज १४.१५) *बहिर्कुम्भक - श्वास को पूर्णतया बाहर निकाल दिया गया हो, शरीर में बिलकुल श्वास न हो, तब दोनों नथुनों को बंद करके श्वास को बाहर ही रोक देना इसको बहिर्कुम्भक कहते हैं ।
संकल्पशक्ति का प्रतीक : रक्षाबंधन * रक्षाबंधन : २९ अगस्त * (पूज्य बापूजी के सत्संग-अमृत से) * सब कुछ देकर त्रिभुवनपति को अपना द्वारपाल बनानेवाले बलि को लक्ष्मीजी ने राखी बाँधी थी । राखी बाँधनेवाली बहन अथवा हितैषी व्यक्ति के आगे कृतज्ञता का भाव व्यक्त होता है । राजा बलि ने पूछा : ‘‘तुम क्या चाहती हो ? लक्ष्मीजी ने कहा : ‘‘वे जो तुम्हारे नन्हे-मुन्ने द्वारपाल हैं, उनको आप छोड दो । भक्त के प्रेम से वश होकर जो द्वारपाल की सेवा करते हैं, ऐसे भगवान नारायण को द्वारपाल के पद से छुडाने के लिए लक्ष्मीजी ने भी रक्षाबंधन-महोत्सव का उपयोग किया । (ऋषि प्रसाद : अगस्त २०१०) * भारतीय संस्कृति का रक्षाबंधन-महोत्सव, जो श्रावणी पूनम के दिन मनाया जाता है, आत्मनिर्माण, आत्मविकास का पर्व है । अपने हृदय को भी प्रेमाभक्ति से, सदाचार-संयम से पूर्ण करने के लिए प्रोत्साहित करनेवाला यह पर्व है । * रक्षाबंधन के पर्व पर एक-दूसरे को आयु, आरोग्य और पुष्टि की वृद्धि की भावना से राखी बाँधते हैं । (ऋषि प्रसाद : अगस्त २०१०) * रक्षाबंधन का उत्सव श्रावणी पूनम को ही क्यों रखा गया ? भारतीय संस्कृति में संकल्पशक्ति के सदुपयोग की सुंदर व्यवस्था है । ब्राह्मण कोई शुभ कार्य कराते हैं तो कलावा (रक्षासूत्र) बाँधते हैं ताकि आपके शरीर में छुपे दोष या कोई रोग, जो आपके शरीर को अस्वस्थ कर रहे हों, उनके कारण आपका मन और बुद्धि भी निर्णय लेने में थोडे अस्वस्थ न रह जायें । सावन के महीने में सूर्य की किरणें धरती पर कम पडती हैं, किस्म-किस्म के जीवाणु बढ जाते हैं, जिससे किसीको दस्त, किसीको उलटियाँ, किसीको अजीर्ण, किसीको बुखार हो जाता है तो किसीका शरीर टूटने लगता है । इसलिए रक्षाबंधन के दिन एक-दूसरे को रक्षासूत्र बाँधकर तन-मन-मति की स्वास्थ्य-रक्षा का संकल्प किया जाता है । रक्षासूत्र में कितना मनोविज्ञान है, कितना रहस्य है ! अपना शुभ संकल्प और शरीर के ढाँचे की व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए यह श्रावणी पूनम का रक्षाबंधन महोत्सव है । (ऋषि प्रसाद : अगस्त २०१०) * ‘रक्षाबंधन के दिन रक्षासूत्र बाँधने से वर्ष भर रोगों से हमारी रक्षा रहे, बुरे भावों से रक्षा रहे, बुरे कर्मों से रक्षा रहे- ऐसा एक-दूसरे के प्रति सत्संकल्प करते हैं । (ऋषि प्रसाद : अगस्त २०१०) * रक्षाबंधन के दिन बहन भैया के ललाट पर तिलक-अक्षत लगाकर संकल्प करती है कि ‘जैसे शिवजी त्रिलोचन हैं, ज्ञानस्वरूप हैं, वैसे ही मेरे भाई में भी विवेक-वैराग्य बढे, मोक्ष का ज्ञान, मोक्षमय प्रेमस्वरूप ईश्वर का प्रकाश आये । * रक्षाबंधन के दिन बहन भैया के ललाट पर तिलक-अक्षत लगाकर संकल्प करती है कि ‘मेरा भाई इस सपने जैसी दुनिया को सच्चा मानकर न उलझे, मेरा भैया साधारण चर्मचक्षुवाला न हो, दूरद्रष्टा हो । (ऋषि प्रसाद : अगस्त २०१०) * रक्षाबंधन के दिन बहन भैया के ललाट पर तिलक-अक्षत लगाकर संकल्प करती है कि ‘मेरे भैया की सूझबूझ, यश, कीर्ति और ओज-तेज अक्षुण्ण रहें । * रक्षाबंधन पर्व समाज के टूटे हुए मनों को जोडने का सुंदर अवसर है । इसके आगमन से कुटुम्ब में आपसी कलह समाप्त होने लगते हैं, दूरी मिटने लगती है, सामूहिक संकल्पशक्ति साकार होने लगती है । (ऋषि प्रसाद : अगस्त २०१०) * बहनें रक्षाबंधन के दिन ऐसा संकल्प करके रक्षासूत्र बाँधें कि ‘हमारे भाई भगवत्प्रेमी बनें । और भाई सोचें कि ‘हमारी बहन भी चरित्रप्रेमी, भगवत्प्रेमी बने । अपनी सगी बहन व पडोस की बहन के लिए अथवा अपने सगे भाई व पडोसी भाई के प्रति ऐसा सोचें । आप दूसरे के लिए भला सोचते हो तो आपका भी भला हो जाता है । संकल्प में बडी शक्ति होती है । अतः आप ऐसा संकल्प करें कि हमारा आत्मस्वभाव प्रकटे । (ऋषि प्रसाद : अगस्त २०१०) * सर्वरोगोपशमनं सर्वाशुभविनाशनम् । सकृत्कृते नाब्दमेकं येन रक्षा कृता भवेत् ।। ‘इस पर्व पर धारण किया हुआ रक्षासूत्र सम्पूर्ण रोगों तथा अशुभ कार्यों का विनाशक है । इसे वर्ष में एक बार धारण करने से वर्ष भर मनुष्य रक्षित हो जाता है । (भविष्य पुराण) (ऋषि प्रसाद : अगस्त २०१०) * येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः । तेन त्वां अभिबध्नामि रक्षे मा चल मा चल ।। जिस पतले रक्षासूत्र ने महाशक्तिशाली असुरराज बलि को बाँध दिया, उसीसे मैं आपको बाँधती हूँ । आपकी रक्षा हो । यह धागा टूटे नहीं और आपकी रक्षा सुरक्षित रहे । - यही संकल्प बहन भाई को राखी बाँधते समय करे । शिष्य गुरु को रक्षासूत्र बाँधते समय ‘अभिबध्नामि के स्थान पर ‘रक्षबध्नामि कहे । (ऋषि प्रसाद : अगस्त २०१०)
🚩🚩जागो हिंदुस्तानी🚩🚩 ⛳पाकिस्तान में बनेगा हिन्दू मंदिर । ⛳पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने खबर पख्तूनख्वाह प्रांत में कट्टरपंथियों द्वारा ध्वस्त किए गए हिंदू मंदिर का फिर से निर्माण करवाने का आदेश दिया है । यह आदेश चीफ जस्टिस जवाद एस. ख्वाजा की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच ने दिया । ⛳टेरी गांव में स्थित श्री परमहंस महाराज की समाधि का फिर से निर्माण करने की योजना तैयार करने का आदेश दिया है । ⛳चीफ जस्टिस ने यह भी कहा कि आदेश की अवहेलना न की जाए और उसे हर हाल में लागू किया जाए। यह मंदिर उस जगह पर है, जहां 1919 में श्री परमहंस की समाधि बनाई गई थी। उनके अनुयायी 1997 तक इस मंदिर में आते रहे लेकिन कुछ कट्टरपंथियों ने इसे ढहा दिया । ⛳ मंदिर के पुनर्निर्माण संबंधी पूर्व आदेश का पालन किया गया है और मंदिर की चारदीवारी खड़ी करवाई गई है और मौलवी इफ्तिखारुद्दीन के घर से होकर समाधि पर जाने का अधिकार भी दे दिया है । 💥http://goo.gl/ufQstn 🎌 #JagoHindustani BlogSpot : http://jagohindustanee.blogspot.com 💥राष्ट्र संस्कृति प्रचार पेज को अवश्य लाइक करे । 👇👇👇 https://m.facebook.com/profile.php?id=1423559047950682 🚩🇮🇳🚩जागो हिंदुस्तानी🚩🇮🇳🚩
आरोग्यता की कुंजियाँ हस्त-चिकित्सा हस्त-चिकित्सा शरीर के किसी भी अंग की पीड़ा का चमत्कारिक ढंग से निवारण करनेवाली, स्वास्थ्य एवं सौन्दर्यवर्धक चिकित्सा पद्धति है ।
मानसिक पवित्रता और एकाग्रता के साथ मन में निम्नलिखित वेदमंत्र का पाठ करते हुए दोनों हथेलियों को परस्पर रगड़कर गरम करें, तत्पश्चात् उनसे पाँच मिनट तक पीड़ित अंग का बार बार सेंक करें और उसके बाद नेत्र बन्द करके कुछ मिनट तक सो जाइये । इससे गठिया, सिरदर्द तथा अन्य सब प्रकार के दर्द दूर होते हैं । मंत्र इस प्रकार है:
अयं मे हस्तो भगवानयं मे भगवत्तर:। अयं मे विश्वभेषजोsयं शिवाभिमर्शनम्॥
“मेरी प्रत्येक हथेली भगवान (ऐश्वर्यशाली) है, अच्छा असर करनेवाली है, अधिकाधिक ऐश्वर्यशाली और अत्यंत बरकतवाली है । मेरे हाथ में विश्व के सभी रोगों की समस्त औषधियाँ हैं और मेरे हाथ का स्पर्श कल्याणकारी, सर्व रोगनिवारक तथा सर्व सौन्दर्यसंपादक है |” आपकी मानसिक पवित्रता तथा एकाग्रता जितनी अधिक होगी, उसी अनुपात में आप इस मंत्र द्वारा हस्त-चिकित्सा में सफल होते चले जायेंगे । अपनी हथेलियों के इस प्रकार के पवित्र प्रयोग से आप न केवल अपने, अपितु अन्य लोगों के रोग भी दूर कर सकते हैं । ( विस्तृत जानकारी के लिए आश्रम से प्रकाशित पुस्तक ‘आरोग्यनिधि-1’ के पृष्ट- 177 पर देखें । )
नाग पंचमी (१९ अगस्त, २ सितम्बर (राजस्थान की परम्परा के अनुसार)) हमारे देश की सनातन संस्कृति ने विश्व को कल्याण का मार्ग ही नहीं बताया बल्कि ‘वसुधैव कुटुम्बकम का सूत्र देकर सिर्फ मानव के प्रति ही नहीं वरन् प्राणिमात्र से प्रेम करने की प्रेरणा दी है । ‘नाग पंचमी का पर्व इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है । इस पर्व पर नागों की पूजा की जाती हैं । पुराणों में इसकी अनेक कथाएँ मिलती हैं । ‘नाग पंचमी मनाने का चाहे जो भी कारण हो, किंतु यह पर्व इस बात को, तो पूर्ण रूप से स्पष्ट करता है कि हमारी संस्कृति समग्र विश्व को कुटुम्ब मानकर हिंसक प्राणियों के प्रति भी वैर वृत्ति न रखने की, उनके प्रति सद्भाव जगाने की तथा उन्हें अभयदान देने की ओर संकेत करती है । भगवान शंकर के गले में सर्प तथा भगवान विष्णु की शैया का शेषनाग इसी बात का प्रमाण है कि जो महापुरुष सभी प्राणियों में अपनी आत्मा को निहारता है, सर्प जैसे विषैले जीव भी उसके मित्र हो जाते हैं । सर्प जैसे जहरीले प्राणी को भी देवताओं का स्थान देकर प्रेम तथा भक्ति-भाव से उसकी पूजा करना-यह भारतीय संस्कृति तथा ऋषि-मुनियों की ही देन है । राग-द्वेष, तथा विनाश की ओर दौडते इस विश्व में ऐसे पर्वों के माध्यम से भी जो शांति एवं प्रेम कायम है वह इस देश की सनातन संस्कृति तथा भारत के संतों के इसी प्रेम का ही प्रभाव है । (लोक कल्याण सेतु : जुलाई १९९८)
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सत्यं ज्ञानं अनन्तं ब्रह्म।
सत्यं ज्ञानं अनन्तं ब्रह्म।
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सर्वत्र ओतप्रोत चैतन्यघन परमात्मा का अनुभव करना जिसके जीवन का लक्ष्य है, वह देर सवेर परमात्मामय हो जाता है।
परमात्मा आनन्दस्वरूप है, चैतन्य स्वरूप है, ज्ञानस्वरूप है। कीड़ी में भी ज्ञान है कि क्या खाना, क्या नहीं खाना, कहाँ रहना और कहाँ से भाग जाना। कीड़ी में चेतना भी है। कीड़ी भी सुख के लिए ही यत्न करती है।
सत्यं ज्ञानं अनन्तं ब्रह्म।
ब्रह्म सत्यस्वरूप है, ज्ञानस्वरूप…
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जैसा खाओ अन्न…. बासमती चावल बेचने वाले एक सेठ की स्टेशन मास्टर से साँठ-गाँठ हो गयी। सेठ को आधी कीमत पर बासमती चावल मिलने लगा। सेठ को हुआ कि इतना पाप हो रहा है तो कुछ धर्म-कर्म भी करना चाहिए।