खिड़की की धूप
सुबह की पहली किरण जब खिड़की से आकर उसके चेहरे को छूती, तो वह आँखें मूँद लेता और दूसरी ओर करवट बदल लेता। यह रोशनी उसे याद दिलाती थी कि एक और दिन शुरू हो गया है। एक और दिन… उसके बिना। आठ महीने हो गए थे। आठ महीने, दो हफ़्ते, और पाॅऀच दिन। पहले-पहले तो लगा था कि सब कुछ ख़त्म हो गया। दिल की धड़कन सिर्फ़ एक आदत बनकर रह गई थी, साँसें सिर्फ़ एक मजबूरी। घर वैसा ही था, फिर भी अब यह घर नहीं, सिर्फ एक जगह…
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