ना जाने कौन सी खिड़की खुली थी (एक दुखांतक संस्मरण / लघुकथा)
ना जाने कौन सी खिड़की खुली थी (एक दुखांतक संस्मरण / लघुकथा)
अमूमन सुबह थोडी जल्दी नींद खुल जाती है पर उस दिन छुट्टी थी इसलिये सुबह थोडी देर से सोकर उठे। बालकनी मे आये तो देखा आसमान मे काले बादल छाये थे और बहुत अच्छी हवा भी चल रही थी। हल्की बरसात के आसार थे। मौसम बहुत ही खुशनुमा था तो सोचा छत पर चलकर मौसम का आनन्द लिया जाय। छत पर जाने के लिये अभी दो-तीन सीढिया ही चढ़े थे कि अगली सीढियों पर अजब ही मंजर दिखा। देखकर मन विचलित हो गया और पांव अपने आप ठिठक कर रुक…
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